राजयोग / अष्टांग योग – पतंजलि के योगसूत्र से शांति, सुख और समृद्धि कैसे पाए – भाग 1: यम
मैं पिछले पाँच- छे-सात या और भी ज्यादा सालों से मेडिटेशन कर रहा हूँ, लेकिन कुछ खास फर्क बिलकुल नहीं पड़ा है। बस इतना है की मेडिटेशन करते वक़्त लगता है जैसे कुछ अच्छा होने वाला है… पर जैसे ही मेडिटेशन खत्म होता है, वही पुराना तनाव, गुस्सा और अहंकार फिर से लौट आता है। ऐसा क्यों हो रहा है?

क्या मेडिटेशन से सच में शांति, सुख और धन मिल सकता है?

इसका सीधा जवाब है – हाँ, बिलकुल मिल सकता है। सुख, स्वास्थ, धन - सब कुछ। 

मेडिटेशन के ज़रिए इंसान एक शांत, सुखी और खुशहाल ज़िंदगी जी सकता है।

तो फिर दिक्कत कहाँ है? इतने साल ध्यान करने के बाद भी बहुत से लोग ऐसा क्यों महसूस करते हैं कि कुछ भी हासिल नहीं हुआ?

अक्सर मुझसे कहते:

"मैं पिछले पाँच- छे-सात या और भी ज्यादा सालों से मेडिटेशन कर रहा हूँ, लेकिन कुछ खास फर्क बिलकुल नहीं पड़ा है। बस इतना है की मेडिटेशन करते वक़्त लगता है जैसे कुछ अच्छा होने वाला है पर जैसे ही मेडिटेशन खत्म होता है, वही पुराना तनाव, गुस्सा और अहंकार फिर से लौट आता है। ऐसा क्यों हो रहा है?"

ऐसी बातें ज्यादा तौर पर या यूँ कहो लगभग सभी लोगों से सुनने को मिलती हैं।

यहाँ तक कि जो लोग खुद को बहुत आगे बढ़ा हुआ साधक मानते हैं, वो भी जब जीवन में कोई मुश्किल आती है तो गुस्से में आ जाते हैं, उनका अहंकार जाग उठता है, और छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़े हो जाते हैं।

तो, इस से एक एहम और बड़ा सवाल खड़ा होता है –

क्या हम मेडिटेशन को सही ढंग से समझ नहीं पा रहे हैं?

या, क्या हम गलत तरीके से मेडिटेशन कर रहे हैं?

या फिर हमसे कुछ ज़रूरी चीज़ छूट रही है, जो मेडिटेशन के साथ-साथ करनी चाहिए ताकि अंदर से असली और गहरा बदलाव आ सके?

सच तो ये है कि:

मेडिटेशन अकेले कभी भी  चमत्कार नहीं कर सकता कभी भी नहीं।   

यह तो बस एक सिस्टम का हिस्सा है – एक ऐसा सिस्टम जिसका हर हिस्सा ज़रूरी है। कोई एक छूट जाये तो सब गड़बड़ा जाता है।

और उस महान सिस्टम का नाम है - 'राज योग' (महर्षि पतंजलि का योग सूत्र)।  

यहाँ, मैं  आगे बढ़ने से पहले एक बात बता दूँ कि - कुछ लोग कहते हैं और विश्वास भी रखते हैं कि – मेडिटेशन करते करते बाकि भी आ जायेगा – पर यह सरासर गलत है।  रामायण में रत्नाकर/वाल्मिकी और रावण के साथ ऐसा हुआ होगा।  महाभारत में अर्जुन और जयद्रथ के साथ भी हुआ होगा।  लेकिन यह नौवे अवतार सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के साथ नहीं हुआ।  और आज हमारे साथ तो कभी भी नहीं होगा – जहाँ हिंसा, जातिभेद, निंदा-चुगली और छल-कपट से ही दुनिया चल रही हो।  

अब, जैसे कि मैंने मेरे पिछले ब्लॉग में कहा था कि राज योग/अष्टांग योग के बारे में विस्तार से बताऊंगा, तो आओ जानते हैं राजयोग/अष्टांग योग के 8 अंगों (भाग) की ताक़त को।

अगर आप वाकई अपने जीवन को बदलना चाहते हो, तो सिर्फ मेडिटेशन से कुछ नहीं होगा।

मेडिटेशन या ध्यान असल में सातवां स्तर है – पतंजलि के योगसूत्र में बताए गए अष्टांग योग के आठ सुंदर पड़ावों में से एक।

यह रास्ता न सिर्फ अंदरूनी शांति और आनंद देता है, बल्कि ज़िंदगी में स्थायी सफलता और समृद्धि भी ला सकता है –

लेकिन तभी, जब हम इसे पूरे दिल से, पूरे क्रम में अपनाएं। 

संस्कृत में ‘अष्टांग’ दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘अष्ट’ यानी आठ और ‘अंग’ यानी हिस्सा।

जैसा कि मैंने अपने पिछले ब्लॉग में बताया था, अष्टांग योग के ये आठ भाग होते हैं:

1. यम

2. नियम

3. आसन

4. प्राणायाम

5. प्रत्याहार

6. धारणा

7. मेडिटेशन

8. समाधि

राजयोग/अष्टांग योग के आठ कदमों में से – पहले दो कदम: ‘यम’ और ‘नियम’

अब आओ, पहले दो कदमों को समझते हैं —‘यम’ और ‘नियम’।

ऐसा बार बार मैं इसलिए कह रहा हूँ क्यूंकि राजयोग की प्राप्ति (समाधि) इसके बाकी के सात भागों पर निर्भर है। या ऐसे भी समझना और ज्यादा आसान होगा कि यह प्राप्ति अगर मकान की छत है तो इसके पहले के पाँच भाग दीवारें हैं और ये दीवारें जमीन के नीचे की जो नींव पर टिकीं हुई है वो हैं सब से पहले के दो भाग – 'यम' और 'नियम'।   

पहला कदम: यम – नैतिकता की नींव

यम हमें आत्म-संयम और सही आचरण की सीख देता है।

यह बताता है कि पहले अपने अंदर शांति और संतुलन लाओ — तभी तुम बाहर की दुनिया से भी सच्चे रिश्ते बना पाओगे।

अगर ये मूल बातें मजबूत नहीं हों, तो मेडिटेशन करना ऐसा होगा जैसे बिना नींव के घर बनाना — जो बिलकुल ही नहीं टिकेगा।

‘यम’ के पाँच हिस्से होते हैं:

 (a) अहिंसा – हिंसा न करना

अहिंसा का मतलब सिर्फ किसी को मारने पीटने से खुद को रोकना नहीं है — इसका असली मतलब है कोमलता और करुणा।

अपने विचारों, बोलचाल और बर्ताव में भी प्यार लाना।

जैसे, अगर आप खुद से ही हर वक्त शिकायत करते रहते हो, तो उसे बदलो — खुद से भी प्यार से बात करो, जैसे किसी अपनों से करते हो।

 (b) सत्य – सच्चाई के साथ जीना

‘सत्य’ का मतलब है —जो अंदर है, वही बाहर भी दिखे। सिर्फ दूसरों से नहीं, बल्कि खुद से भी ईमानदार रहना।

जब आप अपने जीवन को अपनी सच्चाई पर टिके रहने देते हो, तो अंदर एक हल्कापन आता है… एक गहरी शांति।

 (c) अस्तेय – चोरी न करना

अस्तेय का मतलब सिर्फ चोरी न करना नहीं है।

यह सिखाता है —लालच और जलन को छोड़ो, और जो कुछ भी तुम्हारे पास है, उसकी कदर करना सीखो।

कभी-कभी हम दूसरों का समय, क्रेडिट, या सम्मान भी चुपचाप ले लेते हैं — ये भी एक तरह की चोरी ही है।

 (d) ब्रह्मचर्य – इच्छाओं पर नियंत्रण  

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि ज़िंदगी की खुशियों से मुँह मोड़ लो। बल्कि इसका असली मतलब है —इच्छाओं को समझदारी से संभालना।

जब आप अपने अंदर उठती भावनाओं और लालसाओं को काबू में रखते हो, तो वही ऊर्जा आपके आत्मिक विकास और रचनात्मकता की तरफ बहती है।

 (e) अपरिग्रह – गैर-मालिकाना सोच

अपरिग्रह यानी छोड़ने की कला सीखना।

चाहे वो बेवजह का सामान हो, दुख देने वाले रिश्ते हों, या अपने ही मन की सीमित सोच – जब हम चिपकना छोड़ते हैं, तो नया कुछ आने की जगह बनती है।

यही ‘छोड़ना’ असल में शांति और नये अवसरों की शुरुआत बनता है।

दूसरा कदम: नियम – अंदर से मज़बूत बनना

जब पहला कदम यानी यम से हमारे बाहर की दुनिया में संतुलन आ जाता है, तो अब बारी है ‘अंदर’ की दुनिया पर काम करने की — यह हमें आत्म-अनुशासन और आत्मिक विकास की दिशा में ले जाता है।

‘नियम’ के भी पाँच हिस्से होते हैं:

 (a) शौच – स्वच्छता

शौच का मतलब सिर्फ शरीर को साफ़ रखना नहीं है —यह मन और भावना की सफाई भी सिखाता है। बेमतलब की चीज़ें हटाना, आसपास सफ़ाई रखना, और नकारात्मक विचारों को बाहर निकालना — ये सब मिलकर आपकी साधना को गहराई देते हैं।

(b) संतोष – जो भी है और जैसाभी है, उसमें आनंद लेना

संतोष यानी शुक्रगुज़ार होना, हर हाल में कुछ न कुछ अच्छा देखने की आदत डालना।

जब हम हर वक्त ‘और चाहिए’की दौड़ से बाहर निकलते हैं, तभी असली सुकून और खुशियाँ मिलने लगती हैं।

(c) तपस – धैर्य, सुख-दुख पर नियंत्रण और मानसिक संघर्ष में शांत रहना

तपस (तप) आत्म-अनुशासन की वो आग है, जो हमें बदलती है। चाहे वो रोज़ मेडिटेशन के लिए जल्दी उठना हो, या कोई संकल्प निभाना — तपस हमें पक्के रास्ते पर टिकाए रखता है।

यही तपस धीरे-धीरे हमें मजबूत बनाता है।

 (d) स्वाध्याय – खुद को समझना

स्वाध्याय यानी खुद के मन, व्यवहार और सोच पर नज़र डालना।

मैं क्या सोच रहा हूँ? क्यों कर रहा हूँ? इस पर रोज़ गौर करते रहना।

धार्मिक या आध्यात्मिक किताबें पढ़ना, या डायरी लिखना — ये सब इस अभ्यास को और गहरा बनाते हैं।

(e) ईश्वर-प्रणिधान – (खुद को ऊपरवाले के हवाले कर देना)

समर्पण का मतलब हार मानना नहीं होता। इसका मतलब है — अब हर चीज़ को कंट्रोल करने की कोशिश छोड़ देना और उस शक्ति (जो आपसे बहुत बड़ी है) पर भरोसे के साथ ज़िंदगी को जीना।

क्या ये बात पूरी तरह समझ में आई?

मुझे उम्मीद है कि आई होगी। लेकिन मैंने देखा है कि ज़्यादातर लोग ‘यम’ और ‘नियम’ की असली बात को समझ ही नहीं पाते। अक्सर लोग या तो इसे गलत समझ लेते हैं, या फिर इसे बिल्कुल नज़रअंदाज़ कर देते हैं — और सीधा मेडिटेशन पर कूद जाते हैं। और फिर होता ये है कि मेडिटेशन से उन्हें कोई ख़ास फायदा नहीं मिलता। और फिर शिकायत करते हैं कि “मेडिटेशन से कुछ फर्क नहीं पड़ा…”

सच कहूँ तो —अगर ये दो शुरुआती कदम सही नहीं उठाए, तो मेडिटेशन सिर्फ एक अच्छा-सा एहसास बनकर रह जाएगा, जिसका कोई गहरा या स्थायी असर नहीं होगा।

तो चलो, अब मैं आपको इन बुनियादी दो चीज़ों को फिर से एकबार एकदम साफ़-साफ़ और गहराई से समझाता हूँ — ताकि आप मेडिटेशन की असली ताक़त को पूरी तरह महसूस कर सको। 

यम:  पांच सामाजिक अनुशासन

a)  अहिंसा — (हिंसा न करना)

सच्चा अहिंसा बहुत गहरा होता है — ये सिर्फ किसी को न मारने या न चोट पहुँचाने तक सीमित नहीं है। असली अहिंसा तो हमारी सोच, हमारी ज़ुबान, और हमारे हर छोटे-बड़े कामों में झलकनी चाहिए।

आओ, इसके असली मायने को थोड़ा और करीब से समझते हैं।

1. सोच में अहिंसा — मन में भी मत मारो

हिंसा पहले मन में जन्म लेती है, फिर व्यवहार में आती है। जलन, गुस्सा, नफरत, बदला लेने की भावना — ये सब अंदर की हिंसा ही तो है। 

किसी के बारे में बुरा सोचना, खुद को कोसना, या किसी की बर्बादी की कामना करना —

ये सब आपके ही मन की शांति को तोड़ देता है।

क्या करें और कैसे करें?

सब से पहले तो लोगों को माफ करना सीखो।

दूसरों के नजरिए से सोचो — हर कोई अपनी जगह से ठीक हो सकता है।

खुद से प्यार करो — खुद को मत कोसो। अपने मन से दया की शुरुआत करो।

2. शब्दों में अहिंसा — बोलने में भी प्यार हो

कहते हैं, बातों से जख्म भी लगते हैं और मरहम भी। कई बार हम जाने-अनजाने अपनी बातों से चोट पहुँचा देते हैं। कटाक्ष, गाली, ताना, पीठ पीछे बुराई — ये सब शब्दों की हिंसा है।

क्या करें और कैसे करें?

बातों में मिठास लाओ, लेकिन सच बोलना न भूलो।

निंदा-चुगली, झूठ, या किसी को नीचा दिखाने से बचो।

ऐसे शब्द चुनो जो किसी को हिम्मत दें, गिराएँ नहीं।

3. कर्मों में अहिंसा — हाथ से ही नहीं, व्यवहार से भी

अब बात करें असली कर्म की — मतलब हमारा व्यवहार और काम से किसी को तकलीफ ना पहुँचे।

किसी को जानबूझकर नुकसान पहुँचाना, किसी की तकलीफ का कारण बनना, या अपने स्वार्थ में किसी को धोखा देना — ये सब बाहरी हिंसा के रूप हैं।

क्या करें और कैसे करें?

जहाँ तक हो सके, मदद करो, हानि नहीं।

हर किसी के साथ ऐसा बर्ताव करना कि उसके मन को भी शांति मिले।

चाहे किसी की तकलीफ समझ कर एक अच्छा शब्द बोलना हो या किसी अन्याय के खिलाफ खड़ा होना — ये सब अहिंसा के कर्म हैं।

अपने हर काम से पहले सोचो — इससे किसी को तकलीफ तो नहीं हो रही?

मसलन — मैंने हमारे भारत देश में लगभग हर प्रदेश, हर शहर में देखा है कि पूजा हो, शादी हो, मीटिंग हो या कुछ और — लोग गली या आम रास्ते में ही पंडाल या स्टेज बना लेते हैं और मज़े से सब चलता है। अब किसी की गाड़ी अटकी, किसी की बाइक फँसी, कोई बेचारा दस कदम के रास्ते के लिए दो किलोमीटर घूम के जाए — तो किसे फर्क पड़ता है?

मतलब साफ़ है — दूसरों की परेशानी की परवाह किए बिना, अपने काम से मतलब रखना ही जैसे हमारी आदत बन गई है।

ये भी एक तरह की हिंसा ही है — अपने मतलब के लिए दूसरों को तकलीफ़ देना।

ये आदत आज ही छोड़ दो — क्योंकि अहिंसा सिर्फ़ मार-पीट ना करने का नाम नहीं है, बल्कि दूसरों की ज़िंदगी आसान बनाना – हर काम, हर सोच, हर बात में प्यार, शांति और करुणा फैलाना भी उसी का हिस्सा है।  

अहिंसा की ताकत – अंदर से बदल देती है इंसान को

जब आप अहिंसा को पूरे मन से अपनाते हो, तो आपकी ज़िंदगी ही बदलने लगती है।

मन को शांति मिलने लगती है।

रिश्तों में मधुरता और विश्वास आने लगता है।

आसपास की दुनिया भी धीरे-धीरे सकारात्मक बनने लगती है।

अब बढ़ते हैं दूसरे यम की ओर —

b) सत्य – सच बोलो, और सच जीओ

‘सत्य’ का मतलब है —सच बोलना।

लेकिन योग के रास्ते पर इसका मतलब इससे भी कहीं ज्यादा गहरा।

सत्य का साधारण मतलब है:

झूठ मत बोलो।

बातों को तोड़-मरोड़ कर मत कहो।

किसी को धोखा मत दो।

ईमानदारी से जिओ।

अपने मन, सोच और कर्मों में सच्चाई और पारदर्शिता रखो।

सत्य का गहरा मतलब:

जो हो, वही दिखाओ।

खुद से झूठ मत बोलो।

अपने दिल की आवाज़ सुनो और उसी के मुताबिक जिओ।

जब आप अपने आप से सच्चे हो जाते हो, तभी दुनिया के साथ भी सच्चे रिश्ते बना सकते हो।

मतलब के लिए नक़ाब मत पहनो।

जो भी बोलो, वो किसी का भला करे — तकलीफ़ न दे।

याद रखो — सत्य अगर करुणा से अलग हो जाए, तो वह क्रूरता बन सकता है। इसलिए सत्य हमेशा अहिंसा का हाथ पकड़कर चलता है।

क्या करें और कैसे करें?

1. सच बोलो — लेकिन प्यार से।

अगर आपका सच किसी को ठेस पहुँचा सकता है, तो एक पल रुक जाओ।

क्या उसे थोड़ा कोमलता से कहा जा सकता है?

या क्या थोड़ी देर चुप रहना बेहतर होगा, जब तक वो सुनने को तैयार न हो?

उदाहरण:

अगर आप का दोस्त पूछे — “क्या मैं इस ड्रेस में अच्छा लग रहा हूँ?”

और आपको लगता है कि नहीं —  

तो सीधे "नहीं" मत कहो।

बल्कि ऐसा कह सकते हो — “वो जो कल वाले पहने थे ना, उसमें तो तुम सच में निखर रहे थे।”

2. वो मत बनो, जो आप हो ही नहीं ।

दुनिया को खुश करने के लिए दिखावा मत करो।

कोई बनावटी कहानी गढ़ने की ज़रूरत नहीं।

दिल से बोलो:

“मुझे नहीं पता।”  

“मुझे थोड़ा वक़्त चाहिए सोचने के लिए।”

“मैं ऐसा ही हूँ।”

3. अपने मूल्यों के साथ सच्चे रहो — चाहे जितना मुश्किल हो।

कभी-कभी सच बोलना आसान नहीं होता। हो सकता है आपको कुछ खोना पड़े —लोकप्रियता, पैसा, या आराम।

लेकिन जब आप सच का साथ देते हो — तो आपकी आत्मा शांत रहती है, और आप अंदर से मजबूत बनते हो।

उदाहरण:

अगर काम में आपसे कोई ग़लती हो गई है, तो उसे छुपाने या बहाना देने के बजाय मान लो। माफ़ी मांगो और सुधारो।

यह है — सत्य का साहस।

4. अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनो।

जब भी उलझन में हों, अपने अंदर झांको।

खुद से पूछो:

 “इस वक़्त मेरे लिए क्या सच्चा है?”

हमारे अंदर की आवाज़ — वो ‘अंतरात्मा’ — अक्सर सबसे सच्चा मार्गदर्शक होती है।

उसे सुनना और मानना — यह भी सत्य का हिस्सा है।

5. फालतू बात या आधा सच मत बोलो।

अगर किसी के बारे में कुछ कहने जा रहे हों, तो पहले खुद से पूछो:  

क्या ये सच है?

क्या ये ज़रूरी है?

क्या ये किसी का भला करेगा?

अगर तीनों का जवाब "हाँ" है — तभी बोलो। वरना चुप रहना ही बेहतर है।

‘सत्य’ के अंदर की शक्ति:

जब आप सच्चाई के साथ जीते हो, लोग आप पर भरोसा करने लगते हैं।

आपके रिश्ते गहरे और साफ़ हो जाते हैं।

आपका मन शांत हो जाता है — क्योंकि, न तो कोई अपराधबोध रहता है, न ही झूठ पकड़े जाने का डर।

और धीरे-धीरे, आपके शब्दों में शक्ति आ जाती है — जिसे प्राचीन योगी "सत्य सिद्धि" या "वाक् सिद्धि" कहते थे — जहाँ आपके शब्द सच होने लगते हैं, क्योंकि आप उन्हें एक शुद्ध स्थान से बोलते हो।

सीधी बात यह है कि:

ईमानदार बनो। सच्चे बनो। दयालु बनो। खुद बने रहो।

झूठ या बनावटी मुस्कानों के पीछे मत छिपो। प्यार से बोलो, सच्चाई से जियो, और अपने अंदर की आवाज़ को सुनो। यही है ‘सत्य’ — एक आईना, जो हमेशा आपको अपनी अंतरात्मा और आप के अंदर की सब से बड़ी शक्ति को दिखा देता है।

c)  अस्तेय (चोरी न करना) – समृद्धि की कुंजी

पहली नजर में अस्तेय बहुत सीधा लगता है — चोरी मत करो। लेकिन गहराई से देखा जाए, तो यह सिर्फ भौतिक वस्तुओं की चोरी से कहीं ज़्यादा है।

यह उस आदत को हटाने की बात है, जिसमें हम किसी भी रूप में वह ले लेते हो जो हमारा हक़ नहीं है।

चोरी कैसे छुप-छुपाकर होती है?

समय की चोरी – क्या आप मीटिंग्स या अपॉइंटमेंट्स में देर से पहुँचते हो? क्या आप अपने ही समय को बेकार की चीज़ों में गंवाते हो?

समय की चोरी —चाहे अपनी हो या दूसरों की — काम बिगाड़ती है और ज़िंदगी में गड़बड़ी लाती है।                                                           

भावनात्मक चोरी – क्या आप दूसरों से लगातार अटेंशन, तारीफ़ या इमोशनल सपोर्ट की मांग करते हो, बिना बदले में कुछ दिए? — तो ये रिश्ता नहीं, बस भावनात्मक चोरी है। रिश्ते केवल लेने के लिए नहीं, देने के लिए भी होते हैं। 

बौद्धिक चोरी – क्या आप किसी की बात, आइडिया या काम की नकल करते हो बिना उसका ज़िक्र किए? सच्चा सीखना मेहनत और इज़्ज़त से होता है, शॉर्टकट से नहीं।

दौलत और कामयाबी की चोरी – क्या आप दूसरों की कामयाबी से जलते हो और सोचते हो कि किसी भी तरह जल्दी वो सब पा लिया जाए? और आप वैसा ही कुछ या उसी से मिलता जुलता कुछ शुरू कर देते हो?  तो यह दौलत और कामयाबी की चोरी है। लेकिन सच्चाई ये है कि कायनात सिर्फ सच्ची मेहनत को ही इनाम देती है — नकल को नहीं। 

अस्तेय का अभ्यास कैसे लाता है समृद्धि और शांति?

जब हम अस्तेय का पालन करते हैं, तो हमारी सोच नकल या चोरी कर लेने से सृजन की ओर बदल जाती है। हम दूसरों की चीजों की लालसा छोड़कर अपनी प्रतिभा, परिश्रम और संसाधनों पर ध्यान देने लगते हैं। यह सोच स्वाभाविक रूप से समृद्धि लाती है।

जब आप अपना और दूसरों का वक़्त बर्बाद करना बंद कर देते हो, तो आपका काम बेहतर होता है — और तरक्की के रास्ते अपने-आप खुलने लगते हैं।

जब आप दूसरों की कामयाबी को देखकर जलना छोड़ देते हो, तो आपको अपने रास्ते की साफ़ समझ मिलने लगती है।

जब आप दूसरों की सोच और भावनाओं की इज़्ज़त करते हो, तो रिश्ते भी खुद-ब-खुद बेहतर हो जाते हैं

जो इंसान सच में ‘अस्तेय’को जीता है, वो कभी भी कमी में नहीं रहता — उसके पीछे तो भरपूरता खुद चल के आती है।

d)  ब्रह्मचर्य — ऊर्जा के सही उपयोग की साधना

ब्रह्मचर्य को लोग ज़्यादातर गलत तरीके से समझते हैं। अक्सर लोग सोचते हैं कि इसका मतलब बस शादी न करना या सेक्स से दूर रहना है। लेकिन असली योग की नज़र से देखो, तो ‘ब्रह्मचर्य’ का मतलब है — अपनी इच्छाओं और ऊर्जा पर पूरा कंट्रोल रखना। खासकर अपनी इन्द्रियों की शक्ति को सही दिशा में लगाना, ताकि आप सच्चाई, शांति और अंदरूनी ताक़त की राह पर चल सको।

‘ब्रह्मचर्य’ दो शब्दों से बना है:

ब्रह्म – मतलब परम सत्य, दिव्यता।

चर्य – मतलब चलना, जीना, अभ्यास करना।

तो ब्रह्मचर्य का असली मतलब हुआ — दिव्यता की ओर चलना, अपनी अंतरात्मा की ओर बढ़ना नाकि उस से दूर हो जाना।

असली ज़िंदगी में ब्रह्मचर्य का क्या मतलब है?

इसका मतलब है — अपनी इंद्रियों के पीछे मत भागो।

ऐसी चीज़ों में अपनी एनर्जी मत बहाओ जो बस थोड़ी देर का मज़ा दें और फिर थका कर छोड़ दें।

ये दमन नहीं है — ये समझदारी है।

ज़िंदगी को खुलकर जीओ, लेकिन इच्छाओं के गुलाम मत बनो।

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ब्रह्मचर्य कैसे अपनाएं?

1. ध्यान दो कि आप की ऊर्जा कहाँ जा रही है।

हर बार जब आप सोशल मीडिया, फ़िल्में, गॉसिप, खाने या फैंटेसी में उलझते हो — तो आप की ऊर्जा धीरे-धीरे बहती जाती है।

खुद से पूछो:

"क्या ये मेरी आत्मा को पोषण दे रहा है या बस आदत बना रहा है?"

2. अपनी सेक्शूअल एनर्जी का सम्मान करो।

सेक्स कोई पाप नहीं है — लेकिन इसका गलत या ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल आप के शरीर को कमजोर कर देता है और आप की सोच की सूक्ष्मता को भी नष्ट कर देता है।

इस ताक़तवर ऊर्जा को प्यार, क्रिएटिविटी या आध्यात्मिकता के अभ्यास में लगाओ।

चाहे सिंगल हो या रिलेशनशिप में, ब्रह्मचर्य का मतलब है — सम्मान, संतुलन और पवित्रता के साथ जीना।

3. साधारणता को अपनाओ, ज़रूरत से ज़्यादा में मत उलझो।

ज़्यादा खाना, ज़्यादा सोना, ज़्यादा मज़ा — ये सब दिमाग को सुस्त कर देता है।

ब्रह्मचर्य का मतलब है — हल्का जीना, चीज़ों का आनंद लेना, लेकिन उनमें उलझे बिना।

4. अनुशासन से अंदर की ताक़त बनती है।

डिसिप्लिन ही असली आज़ादी है। जब आप छोटी-छोटी चीज़ों में इच्छाओं को रोकते हो — जैसे वो दूसरा मिठाई का टुकड़ा छोड़ना या किसी बहस के जवाब में चुप रह जाना — यही ब्रह्मचर्य की असली परीक्षा है।

5. अंदर की ओर मुड़ो।

ब्रह्मचर्य का मतलब ये नहीं कि दुनिया छोड़ दो — बल्कि इसका मतलब है कि भीड़ में रहकर भी अपने अंदर उतरो।

थोड़ा वक़्त अकेले रहो, प्रार्थना करो, ध्यान करो, कुछ अच्छा पढ़ो।

उस अंदर की शांति बाहरी मज़े से कहीं ज़्यादा गहरी होती है।

ब्रह्मचर्य की अंदरूनी ताक़त:

जब आप ब्रह्मचर्य से जीते हो —

आप की ऊर्जा स्थिर हो जाती है, बिखरती नहीं।

मन साफ होता है, समझ तेज़ होती है।

मन हल्का लगता है, आत्मा से जुड़ाव गहरा होता है।

आध्यात्मिक ग्रोथ तेज़ी से होती है — क्योंकि अब ऊर्जा नीचे नहीं गिरती, ऊपर उठती है।

योगी कहते हैं कि जब ब्रह्मचर्य पूरी तरह से स्थापित हो जाता है, तो आपका तेज़, आप की नज़र, आप की बात — सब में एक पवित्रता झलकती है।

सरल शब्दों में:

अपनी ऊर्जा को समझदारी से खर्च करो।

शरीर का आदर करो।

इच्छाओं के मालिक बनो, गुलाम नहीं।

सुख के पीछे मत भागो — ऐसे जियो कि सुख खुद तुम्हारे पीछे भागे।

अपनी अंदर की शक्ति को ऊपर उठाओ।

यही है ब्रह्मचर्य — सच्चाई, एकाग्रता और अंदरूनी ताक़त की राह।

e)  अपरिग्रह — न पकड़ने की कला

‘अपरिग्रह’ का मतलब है — लालच, चिपकाव और जोड़-जमा कर रखने की आदत को छोड़ देना।

सिर्फ चीज़ों में नहीं, भावनाओं, रिश्तों और उम्मीदों में भी।

'अ-परि-ग्रह' शब्द का मतलब है:

'अ' – नहीं

'परि' – चारों ओर

'ग्रह' – पकड़ना या थामे रहना

तो अपरिग्रह का मतलब हुआ:

"मत पकड़ो, मत चिपको।" चीज़ों को आने दो, जाने दो। हाथ भी हल्के रखो, दिल भी।

असल में अपरिग्रह क्या होता है?

इसका ये मतलब नहीं कि आप घर छोड़ दो, पैसा छोड़ दो, कपड़े या रिश्ते छोड़ दो।

बस उनसे अपनी चिपकाव की भावना (आसक्ति) छोड़ दो।

अपरिग्रह का मतलब है — गरीब बनना नहीं, आज़ाद बनना।

चीज़ें तुम्हारे पास हों, लेकिन वे तुम्हें पकड़ कर न रखें।

तुम चीज़ों के मालिक हो — चीज़ें तुम्हारी मालिक न बन जाएँ।

ज़िंदगी में अपरिग्रह कैसे लाएँ?

1. जितनी ज़रूरत है, उतना ही रखो।

खुद से एक सीधा सवाल पूछो — “क्या ये चीज़ सच में ज़रूरी है, या मैं बस डर या दिखावे या अहंकार के चलते इसे जमा कर रहा हूँ?”

अगर अलमारी चीज़ों से भरी पड़ी है — तो थोड़ा हल्का कर दो।

अगर मन ख्वाहिशों से भरा है — तो थोड़ा ठहर जाओ।

सादगी कमज़ोरी नहीं, ताक़त होती है।

2. भावनाओं की भीड़ मत लगाओ।

पुरानी बातें, दुख, गुस्सा या पछतावे को बार-बार मत दोहराओ।

जो बीत गया, उसे पकड़ कर मत बैठे रहो।

किसी ने चोट दी — माफ़ करो और आगे बढ़ो।

जो आपकी शांति के लिए ठीक नहीं, उसे अपने अंदर न रखो।

अगर कोई बात खत्म हो गई — तो अतीत से मत चिपको। खाली जगह नई खुशियाँ आने देती है।

3. लोगों और नतीजों पर पकड़ रखने की चाह छोड़ दो।

किसी से प्यार करते हो — तो उसे भी आज़ादी दो। उस पर अपनी पकड़ जमाये मत रखो। प्यार का मतलब ये नहीं कि आप किसी की सोच पर भी अपनी पकड़ रखो।

मेहनत करो — लेकिन नतीजे पर ज़ोर मत डालो।

जितना ज़्यादा पकड़ोगे, ज़िंदगी उतनी ही फिसलेगी।

अपरिग्रह मतलब — खुले हाथ और खुला दिल।

4. अपनी पहचान से भी चिपके मत रहो।

क्या आप अपनी पोस्ट, इमेज, रोल या नाम से बहुत जुड़े हुए हो?

अगर आत्म-सम्मान बाहरी लेबल पर टिका है — तो ये भी एक तरह का लोभ है।

अपरिग्रह कहता है: “आप जैसे हो, वैसे ही काफ़ी हो, बिना इन सब के।”

5. जो है, उसी के लिए शुक्रगुज़ार रहो।

जितना ज़्यादा आप आज की चीज़ों की कद्र करोगे, उतनी ही कम तलब रहेगी किसी और की।

"शुक्रगुज़ारी ही लालच की सबसे असरदार दवा है।"

यानी की, जब आप जो भी हो उसके लिए दिल से शुक्रगुज़ार हो जाते हो, तो फिर और पाने की बेचैनी अपने आप ही कम हो जाती है।

अपरिग्रह के अंदर की ताकत:

जब आप चीज़ों, विचारों और भावनाओं का फ़ालतू बोझ छोड़ देते हो तो —

अपने अंदर हल्कापन आ जाता है।

आप आज़ाद महसूस करते हो।

और फिर आपकी ज़िंदगी में वही आता है, जो वाक़ई आपकी आत्मा के लायक़ होता है।

आपको वो ख़ुशी मिलने लगती है, जो किसी भी जमा-जमाव या पकड़ से कभी नहीं मिल सकती।

योगी कहते हैं — जब अपरिग्रह पूरी तरह उतर जाता है, तब इंसान को अपने पिछले जन्मों की झलक भी मिलने लगती है। क्योंकि तब मन दुनियावी झंझटों से खाली होकर सच्चाई की गहराइयों में उतरने लगता है।

सादे शब्दों में:

मत चिपको, मत समेटो, मत ललचाओ।

ज़िंदगी को हल्के हाथों से पकड़ो।

प्यार करो, लेकिन जकड़ो मत।

चीज़ों के मालिक बनो — लेकिन ऐसा मत होने दो कि चीज़ें आपकी मालिक बन जाएँ।

यही है अपरिग्रह — अंदर और बाहर, दोनों जगह हल्के और आज़ाद होकर जीने की कला।

तो अब आपने ‘यम’ के पाँच रास्तों को जान लिया — ये वही बातें हैं जो योग की शुरुआत में सबसे ज़रूरी मानी जाती हैं। ये कोई सख्त नियम नहीं हैं, बल्कि ज़िंदगी को सच्चे ढंग से जीने की बातें हैं। जो इंसान इन्हें दिल से अपनाता है, उसके अंदर से बहुत सी उलझनें अपने-आप छूटने लगती हैं।

अगले भाग में हम चलेंगे योग की दूसरी सीढ़ी की तरफ़ — ‘नियम’ की ओर। ये रोज़मर्रा की ज़िंदगी में थोड़ा-थोड़ा खुद पर ध्यान देने, अंदरूनी शुद्धता रखने, और शांति से जीने की सीख देता है।

तब तक के लिए — सेहत का ध्यान रखो, मन हल्का रखो, और इन यमों को सिर्फ़ सोचने की चीज़ मत बनाओ — इन्हें रोज़ के छोटे-छोटे कामों में उतारो। असली बदलाव वहीं से शुरू होगा।

अगर ये बातें आपके दिल तक पहुँच रही हैं, और आप इस राह को थोड़ा और गहराई से समझना चाहते हो — चाहे राज योग मेडिटेशन सीखना हो या ये जानना हो कि ये बातें आपकी सेहत, सुख और चैन बढ़ाने में कैसे मदद कर सकती हैं — तो बिल्कुल संकोच मत करो – बेझिझक मुझ से कांटेक्ट करो

आपसे जुड़ना मेरे लिए खुशी की बात होगी।

3 thoughts on “राजयोग / अष्टांग योग – पतंजलि के योगसूत्र से शांति, सुख और समृद्धि कैसे पाए – भाग 1: यम

  1. सरकार साहेब,
    आपको पुनः कोटि कोटि धन्यवाद।
    मैंने स्वामी विवेकानन्द जी के राजयोग पुस्तक पिछले कुछ समय में अध्यन किया किंतु सच कहू तो १०० प्रतिशत नहीं समझ पाया, पुस्तक के शुरुआत के पाठ में कठिन शब्दों के प्रयोग के कारण।
    आपने जिस सरल अंदाज़ में, सरल शब्दों में “यम” अध्याय को समझाया है उसकी जितनी प्रशंसा की जाये वो कम, जैसे वो छोटे कस्बों में सड़क पर पंडाल लगा देना जिसकी वजह से छोटी दूरी दूसरो को बड़ी दूरी परिवर्तित हो जाता है वगैरा वगैरा। सच कहे तो आपने जीवन जीने का सारांश ही बता दिया है वो भी बहुत सरल तरीके से। मेरा तो ये मानना है की जैसे प्रति दिन हम ईश्वर की प्रार्थना में मंत्र पढ़ते है वैसे ही प्रति दिन ये जीवन के यम (आपके ये ब्लॉग) को पढ़ना चाहिए, ३० मिनट की ही तो बात है और ना प्रति दिन तो एक दिन छोड़कर या फिर कम से कम सप्ताह के ही एक दिन रविवार ताकि जीवन के मूल्यों को हम भूल ना पाये।
    आपको पुनः इस प्यारी मोती से खूबसूरत हार को गढ़ने के लिए जो एक आम इंसान के जीवन को बदलने में आसान बनाएगा, कोटि कोटि आभार।
    आपके अगले ब्लॉग ॰नियमाँ॰ के इंतज़ार में 🙏

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