राजयोग / अष्टांग योग – पतंजलि के योगसूत्र से शांति, सुख और समृद्धि कैसे पाए – भाग 2: नियम
पुराने समय में स्वाध्याय का मतलब सिर्फ़ खुद की आदतें देखना नहीं था — उसमें मंत्रों का उच्चारण करना, या धार्मिक श्लोकों को ज़ोर से पढ़ना भी आता था। शब्दों में ऊर्जा होती है। हर बार जब आप कोई मंत्र, कोई अच्छा विचार, या कोई शुभ बात दोहराते हो — तो आप अपने मन को साफ़ कर रहे होते हो।

(अगर आपने पहला भाग नहीं पढ़ा जिसमें हमने पाँच ‘यम’ की बात की थी — तो पहले उसे यहाँ क्लिक करके पढ़ लो। वहीं से असली शुरुआत होती है।)

यम के बाद अब क्या आता है?

नियम — व्यक्तिगत अनुशासन – यानी खुद के साथ कैसा बर्ताव रखना है।

‘यम’ में हमने सीखा था — कि दुनिया से कैसे ठीक तरह से पेश आना है।

अब ‘नियम’ बताता है — कि अपने मन, शरीर और सोच को कैसे ठीक रखना है।

जैसे मैंने पहले भी कहा था — नियम के भी पाँच हिस्से होते हैं।

अब चलो, एक-एक करके सबको समझते हैं।

  1.  शौच — मतलब सफ़ाई

पर रुको ज़रा — क्या इसका मतलब है बस दिन में दो बार नहाना?

नहीं! ज़रा एक बात सोचो कभी ऐसा लगा है कि — कमरा तो अच्छी तरह साफ किया है, फिर भी कुछ ठीक नहीं लग रहा?

या — बहुत अच्छा खाना तो खाया, लेकिन उसके बाद पेट फूल गया, और कुछ अजीब-सी सुस्ती आई, साथ में सिरदर्द भी।

यहीं से शुरू होती है —सच्ची सफ़ाई की बात।

‘शौच’ का मतलब सिर्फ़ साफ़ कपड़े और चमकता कमरा नहीं है।

शौच मतलब है — आपका शरीर, खाना, सोच, भावनाएँ, आदतें — सब कुछ जितना हो सके, उतना साफ़ और हल्का रखना।

आओ, इसे थोड़ा-थोड़ा करके समझते हैं:

a) शरीर की सफ़ाई

अपने आप से पूछो — क्या मैं अपने शरीर का ध्यान रखता हूँ?

नहाना, दाँत साफ़ करना, नाखून काटना — ये तो हर कोई करता है।

लेकिन जो चीज़ें हम शरीर पर लगाते हैं या खाते हैं, क्या वो भी शरीर को साफ़ रखती हैं?

कई लोग तरह-तरह के पाउडर, परफ़्यूम, क्रीम लगाते हैं — जिससे बाहरी बदबू तो छिपती है, पर अंदर का मैल तो वैसा ही रह जाता है।

अब सोचो — इसके बजाय क्यों न हम अपने शरीर की देखभाल नेचुरल तरीक़े से करना शुरू करें — ऐसे उपाय अपनाएं जो सिर्फ़ बाहर से नहीं, बल्कि अंदर से भी शरीर को साफ़ और हल्का बनाएं?

छोटे-छोटे बदलावों से शुरुआत करो — केमिकल्स का कम इस्तेमाल करो, पानी ज़्यादा पीओ, और अपने शरीर की असली ज़रूरतों को ध्यान से सुनो। वहीं से बाहर और अंदर की सफ़ाई एक-दूसरे से मिलने लगती है।   

b) खाने की सफ़ाई

अब ये वाली बात बहुत बड़ी है — और एकदम सच्ची भी।

आजकल ज़्यादातर लोग क्या खाते हैं?

फास्ट फूड, बहुत तीखा मसालेदार खाना, पैकेट में बंद चीज़ें और फिर से गरम किया हुआ बचा खाना।

क्या ये खाना सच में ‘साफ़’ है?

ऐसा खाना पाचनतंत्र पर — खासकर मणिपुर चक्र (जो पेट का ऊर्जा केंद्र है) — ज़रूरत से ज़्यादा दबाव डालता है। और इसका असर मन पर भी दिखता है: चिड़चिड़ापन, भारीपन, बेवजह गुस्सा और सुस्ती।

अब हल क्या है?

साफ़ खाना मतलब ये नहीं कि महंगे फ़्रूट सलाद या उबली सब्ज़ियाँ ही खाओ।

घर का सादा दाल-चावल या रोटी-सब्ज़ी — अगर प्यार से बना हो — तो वही साफ़ होता है।

आजकल बड़े शहरों में लोग पैकेट वाले खाने पर जीते हैं — कभी मजबूरी में, कभी टाइम कम होता है, कभी पैसे की सोच भी होती है।

लेकिन ‘शौच’ (सफ़ाई) हमें ज़बरदस्ती कुछ करने को नहीं कहता — वो सिर्फ़ कहता है, "थोड़ा सोचो। थोड़ा होश में आओ।"

अब अपने आप से बस इतना पूछो — मैं अपने शरीर में क्या डाल रहा हूँ?

अगर बाहर का रेडीमेड खाना भी खा रहे हो — तो देखो, क्या वो कम केमिकल वाला है? थोड़ा कम मीठा है? कम पैकेट वाला है? क्या मैं जब भी मौका मिले, ताज़ा पानी, फल या घर का कुछ हल्का-सा खाकर इसका संतुलन बना सकता हूँ?

यही तो पुल है — पुराने ज़माने की शुद्धता और आज की लाइफ़स्टाइल के बीच। साफ़-सुथरा खाना मतलब सख़्ती नहीं — बस होश से, प्यार से चुना गया खाना।

भाव यह है:

जो खाना हल्का हो, आसानी से पच जाए, और जितना हो सके प्राकृतिक हो — कुछ ऐसा जो ना शरीर को परेशान करे, ना मन को।

और हाँ — एक ज़रूरी बात:

शाकाहारी या “सात्त्विक” होने का कोई दबाव नहीं है। खुद वेदों में भी माँस के सेवन और उसे अर्पित करने के उदाहरण मिलते हैं।

इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि आप क्या खा रहे हो, बल्कि यह है कि वह खाना आपके शरीर और मन को कैसे प्रभावित कर रहा है।

अगर मांसाहारी भोजन भी शांत और संतुलित मन से लिया जाए — बिना लोभ, आकर्षण या अति-आसक्ति के, सिर्फ़ पोषण के लिए खाया जाए — तो वह भी भावना में ‘सात्त्विक’ माना जा सकता है। वह न तो शरीर को नुकसान पहुँचाएगा, न ही मन को विचलित करेगा।

‘लेबल’ से ज़्यादा ज़रूरी है — साफ़, सजग और संतुलित भोजन।

c)  सोच की सफ़ाई       

अब आती है अंदर की बात — क्या कभी आपने नोटिस किया है कि आपकी सोच भी कैसे गंदी हो जाती है?

जलन, इल्ज़ाम, खुद से नफ़रत, पछतावा, ज़्यादा सोचना — ये सब ऐसी धूल है जो हमारे मन से चिपक जाती है।

और जितनी देर हम इन्हें पकड़े रहते हैं — उतना ही हमारा अंदर का आईना धुंधला होता जाता है।

और मज़े की बात ये है — अगर आपके कपड़े चमक रहे हों, फिर भी चेहरा थका हुआ और फीका-सा लगेगा — अगर अंदर सोच में गड़बड़ी आ जाती है तो।

अब एक बात हमेशा याद रखना:

कभी भी अगर एक सेकंड के लिए भी आपके मन में ऐसा ख्याल आ जाए — मौका मिला तो मैं उसे तलाक़ दे दूँगाया अगर हाथ लग जाए तो उसका मुँह तोड़ दूँ — तो वो एक सोच भी आपके अंदर दाग़ छोड़ जाती है

अगर ऐसे ख्याल बार-बार आते रहें — तो वो आपकी ऊर्जा, आपके रिश्ते, और यहाँ तक कि आपकी सेहत तक को बिगाड़ सकते हैं।

तो क्या करना है?

सिर्फ़ होश में रहो।
डरने की ज़रूरत नहीं, शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं — बस जागते रहो

क्योंकि सोच में शक्ति होती है — ये आपके अंदर की दुनिया को बहुत पहले से आकार देने लगते हैं, बाहर असर दिखने से पहले ही।

अब एक छोटी-सी चीज़ करो:

हर दिन एक बार, बस कुछ पल के लिए आँखें बंद करो और खुद से पूछो — मैं अंदर क्या उठाए फिर रहा हूँ, जिसकी अब मुझे ज़रूरत नहीं है?”

उसे छोड़ दो। उसे बाहर निकाल दो। सोच भी कमरे जैसी होती है — उसे भी हर रोज़ साफ़ करना पड़ता है।

d)   भावनाओं और ऊर्जा की सफ़ाई

कभी-कभी बिना वजह ही भारी-सा लगता है? जैसे कुछ मन पर लदा हुआ है —या थकावट है, लेकिन समझ नहीं आता क्यों?

ये सब ऊर्जा की गंदगी होती है।

जब हम ऐसे लोगों के साथ होते हैं जो हर वक़्त बुरा बोलते हैं, चुगली करते हैं, दूसरों की बुराई सोचते हैं, या हर किसी से अपनी तुलना करते हैं —तो ये सब धीरे-धीरे और चुपचाप हमारी भावनाओं को गंदा कर देते हैं।

और अब सुनो — आज की दुनिया में एक सबसे बड़ा नेगेटिव सोर्स क्या है? टीवी न्यूज़

जैसे ही ऑन किया — मर्डर, झगड़ा, इल्ज़ाम, डर, गुस्सा, नकली ड्रामा — बस, कचरा ही कचरा

सिर्फ़ पाँच मिनट में ही वो गंदगी आपके अंदर तक उतर जाती है — और घंटों तक मन परेशान रहता है।

इसका मतलब ये नहीं कि आप जानकारी लेना बंद कर दो। — लेकिन ये ज़रूरी है कि जानकारी कहाँ से ले रहे हो — इसका चुनाव समझदारी से करो।

साफ़ ऊर्जा का मतलब है — अपने दिल-दिमाग को बचाना, सिर्फ़ लोगों से नहीं —बल्कि उस मीडिया से भी जो तुम रोज़ाना देखते और सुनते हो।

‘शौच’ मतलब है — अपने अंदर शांति के लिए जगह बनाना। जो चीज़ें तुम्हारी अंतरात्मा की खुशी में रुकावट बनती हैं, उन्हें छोड़ दो। लोग, जगह, और पुरानी आदतें — जो आपकी अंतरात्मा को गंदा-सा बना दें, उन्हें धीरे-धीरे हटा दो।

e)  एक आख़िरी बातसनक (Obsession) भी गंदगी होती है

अब देखो —कुछ लोग होते हैं जो साफ़-सफ़ाई को लेकर इतने सनकी हो जाते हैं कि दिन में दस बार हाथ धोते हैं, या बार-बार सोचते हैं कि “मैं गंदा हूँ” — जब कि वो पूरी तरह साफ़ होते हैं।

यह तोशौच’ बिलकुल भी नहीं हैये तो एक सनक या चिंता है, जो सफ़ाई का नकाब पहन लेती है।

लेकिन ये ‘सनक’ सिर्फ़ शारीरिक सफ़ाई तक नहीं रुकती।

कई बार हम किसी इंसान से इतने जुड़ जाते हैं, कि फिर हम उसे आँख बंद करके पसंद करने लगते हैं, उसकी हर बात की तारीफ़ करते हैं, और चाहे वो ग़लत ही क्यों न हो — बस उसे बचाने लगते हैं। ऐसा अक्सर अपनों के साथ भी हो जाता है — जैसे परिवार के किसी सदस्य के साथ।

या फिर हम कुछ खास खाने की चीज़ों से ज़िद की तरह जुड़ जाते हैं — शरीर को उनकी ज़रूरत हो या न हो, लेकिन मन झूठे सुकून से चिपक जाता है।

और इसका उल्टा भी उतना ही अशुद्ध होता है — अच्छे, पोषक और सादे खाने को सिर्फ पुराने डर, सामाजिक मान्यताओं या ज़िद की वजह से ठुकरा देना। बहुत से लोग ऐसे साधारण और सेहतमंद भोजन से दूर रहते हैं, यह सोचकर कि ये ‘अच्छे नहीं हैं’ या ‘मना है’ — बिना कभी ये समझे कि शरीर की असली ज़रूरत क्या है।

चाहे आप किसी चीज़ से चिपके रहो, या किसी चीज़ को बिना वजह ठुकराओ — दोनों का जड़ एक ही हैअंदर की गड़बड़

मन की असली सफ़ाई का मतलब है — सजग रहना, शांत रहना, और अपनी सोच की परतों से परे सच को देखने की हिम्मत रखना।

और ये कोई कमज़ोरी नहीं है — यही तो सबसे गहरी ताक़त होती है, मन की सफ़ाई की।

हमेशा एक बात याद रखो:

कोई भी चीज़ जो आपको डर, अपराधबोध, या जबरदस्ती में धकेले —चाहे वो प्यार के नाम पर हो या सेहत के नाम पर —वो दरअसल छुपी हुई गंदगी ही है

सच्चा शौच मन में हल्कापन और जीवन में संतुलन लाता है — और सोच को खुला, सहज बनाए रखता है। 

बस इतना ही।

कोई परफेक्शन नहीं चाहिए — बस एक हल्की सी ध्यान देने की आदत चाहिए । कोई सनक नहीं — बस रोज़ एक सच्चा इरादा चाहिए ।

और इसके लिए न पैसे की ज़रूरत है, न महंगे प्रोडक्ट्स की, न परफेक्ट खाने की।

बस चाहिए —थोड़ी-सी ‘ईमानदारी’ अपने आप से, और थोड़ी-सी चाहत कि जैसे आप बाहर की चीज़ों का ख्याल रखते हो, वैसे ही अंदर के मन का भी प्यार से ख़्याल रखो।

शौच’ यानी शुद्धता —यही है अंदर की खुशी की पहली सीढ़ी।

साफ़ जीवन, साफ़ मन, साफ़ ऊर्जा — यही होती है सच्चे सुकून और शक्ति की असली बुनियाद।

अब चलो थोड़ा और आगे बढ़ते हैं… दूसरे ‘नियम’ पर —‘संतोष’— वो अनमोल कुंजी जो थोड़े में भी मन को पूरा महसूस कराती है।

2.  संतोष — अंदर की तृप्ति

अब सोचो — आजकल के ज़माने में ज़्यादातर लोग उदास या बेचैन क्यों रहते हैं?

क्या इसलिए क्योंकि उनके पास कम है? या इसलिए कि उन्हें हमेशा और चाहिए?

थोड़ा सा दिल पर हाथ रख कर पूछो — क्या कभी आपने नया मोबाइल लिया…और फिर हफ़्ते भर में किसी और का नया मॉडल देखकर थोड़ी-सी जलन महसूस की?

या फिर अच्छा खाना खाया…लेकिन उसके बाद दिल किया कि “काश कुछ मीठा भी होता, तब मज़ा आता!”?

बस यहीं से शुरू होती है ‘संतोष’ की बात।

‘संतोष’ क्या है?

संतोष का मतलब होता है — आप के पास जो कुछ है, जैसे है — उसी में एक सुकून महसूस करना।

इसका मतलब यह नहीं कि आप आगे बढ़ना छोड़ दो या कुछ अच्छा करना बंद कर दो।

मतलब बस इतना है कि आप हर बात में शिकायत करना, दूसरों से तुलना करना, या जो उनके पास है उसे पाने की दौड़ लगाना—ये सब छोड़ दो।

संतोष का मतलब है — इस पल में, जैसी भी ज़िंदगी हो, उसी में एक शांत-सी, सच्ची खुशी महसूस कर पाना… भले ही वो ज़िंदगी “परफ़ेक्ट” न लग रही हो।

पर अब आप पूछ सकते हो — क्या ये सब असली दुनिया में मुमकिन है?

चलो एक छोटा-सा उदाहरण लेते हैं:

मान लो आप एक छोटे से फ्लैट में रह रहे हो, और आपके पड़ोसी ने अभी-अभी एक बड़ा सा 3 बेडरूमवाला फ्लैट ले लिया — बालकनी में गार्डन भी है।

अब ज़ाहिर है — आपको थोड़ा दुख या पीछे छूट जाने जैसा तो लगेगा ही न?

लेकिन सुनो —हो सकता है वही पड़ोसी अब किसी और के बड़े बंगले और लॉन को देखकर उसी तरह दुखी हो रहा हो।

इसलिए समझो —संतोष इस बात पर नहीं टिका है कि आपके पास क्या है, बल्कि इस बात पर है कि आप के पास जो कुछ भी आज है, उसके बारे में आप कैसा महसूस करते हो।

ये इच्छाओं को छोड़ने की बात नहीं — बल्कि उनके गुलाम न बनने की बात है।

कैसे समझोगे कि आपके अंदरसंतोष’ नहीं है?

  • बार-बार चिड़चिड़ापन या बेचैनी
  • किसी और की तरक्की देखकर जलन
  • छोटी-छोटी बातों की शिकायत
  • हमेशा कुछ “और अच्छा” आने का इंतज़ार करना

ये सब चीज़ें अगर आप के अंदर है तो आप के अंदर 'संतोष' नहीं है।

तो कैसे जिएँसंतोष’ को? सिर्फ बातों में नहीं — असली ज़िंदगी में।

तो चलो अब जानें — रोज़ाना की ज़िंदगी में ‘संतोष’ को कैसे अपनाएं:

a) रात मेंशुक्रिया डायरी’ लिखो

हर रात सोने से पहले — बस 3 चीज़ें लिखो जिनके लिए आज दिल से शुक्रिया कह सकते हो। चाहे

कितनी भी छोटी क्यों न हों। जैसे —
“आज का लंच और डिनर सादा था पर अच्छा लगा।”
“आज मैंने दो बार गुस्सा संभाल लिया था।”
“आज मैं दिन में काफ़ी समय खुश था।”

ऐसा रोज़ करने से — दिमाग़ खुद ही अच्छी चीज़ों को देखना सीख जाता है।

b) कुछ भी माँगने से पहले रुको

जब भी मन में आये — “काश मेरे पास वो होता…मैं वैसा होता” तो ज़रा रुक जाओ और खुद को पूछो — “क्या सच में ये चीज़ ज़रूरी है? या मैं बस दूसरों से तुलना कर रहा हूँ?”

बस इतना सा रुकना — कभी-कभी पूरी सोच बदल देता है।

c) बिना किसी हीन भावना के आनंद लो:

एक प्याली चाय…थोड़ा धूप में बैठना…किसी पुराने गाने को सुनना…ये सब छोटी-छोटी चीज़ें भी
अगर दिल से महसूस करो — तो बड़ी-बड़ी ख़ुशियाँ दे देती हैं।

तो जब अच्छा लगे, तो पूरी तरह से उसका मज़ा लो — बिना किसी हीन भावना के। यही है संतोष।

d) एक दिन के लिए सोशल मीडिया से छुट्टी लो

सच कहूं तो — हमारे मन की 90% से ज़्यादा उलझनें आजकल इंस्टाग्राम, यूट्यूब और ना ख़त्म होने वाली रील्स से ही आती हैं।

एक दिन का ब्रेक ले लो ईमानदारी से। सिर्फ़ एक दिन। और खुद देखो — अंदर क्या-क्या बदलता है।

e) अपनी कमियों को अपनाओ

न आपकी नौकरी परफेक्ट है, न आपका जीवनसाथी, न ही आपका शरीर।

लेकिन क्या आप साँस ले पा रहे हो? क्या आप आज ज़िंदा हो? हो ?

तो मान लो — ज़िंदगी पहले से ही बहुत कुछ दे रही है।

एक सीधी-सी बात – एक सुंदर सच्चाई: संतोष का मतलब हार मानना नहीं है।ना ही इसका मतलब काम छोड़ कर खली बैठे रहना या भरपूर आलसीपन से दिन गुजारना।

संतोष एक ताक़त है। वो ताक़त जो दिल से कहती है — मैं पूरी तरह से खुश हूँ। मेरे पास जितना है, उतना काफ़ी है। ये पल, जैसा भी हैबस यही बहुत है।

और जब आप ऐसे जीने लगते होतो सोचो क्या होता है?

ज़िंदगी खुद ही आपको और ज़्यादा देने लगती है। क्योंकि अब आप “ज़रूरतमंद” नहीं रहे — आपमें एक ठहराव है, अब आपके पास शांत रहने की इच्छाशक्ति है— और तभी सुकून, कामयाबी, और असली खुशी आपके पीछे-पीछे आने लगते हैं — बिना आपके दौड़ने के।

अब आता है तीसरा नियम — चलो अब देखते हैं ये हमें क्या सिखाता है।

3. तपस् (स्व-अनुशासन)

क्या आपने कभी सोचा है कि — “अब से मैं जल्दी उठूँगा...” “अब से हेल्दी खाना खाऊँगा...” “अब रोज़ सुबह सैर को जाऊंगा …”  करने भी लगते हो बहुत जोश से, लेकिन फिर भी उस बात पर टिके नहीं रह पाते हो?बस दो दिन... फिर सब पुराने जैसा?

यही जगह है जहाँ 'तपस्' काम आती है।

‘तपस्’ यानी क्या?

तपस् का मतलब है — खुद पर थोड़ी लगाम रखना। लेकिन ऐसा नहीं कि खुद को सज़ा दो या सख़्ती से दबाओ। तपस अंदर की वो आग है — जो धीरे-धीरे, लेकिन मज़बूती से आपको थोड़ा और अच्छा बनने की तरफ़ ले जाती है।

तपस् असल में है क्या?

'तपस' शब्द आया है संस्कृत के 'तप' से — मतलब होता है जलना, तपना।

तो हम क्या जलाते हैं?

हम अपनी आलस जलाते हैं। बहाने जलाते हैं। और वो पुरानी आदतें जो हमें एक ही जगह अटकाए रखती हैं — उन्हें भी धीरे-धीरे जला देते हैं।

और जब ये सब आप जला देते हो — तो जो बचता है, वो है एक तेज चमकता हुआ, साफ़, और मज़बूत “आप”।

क्या तपस् का मतलब है आनंद लेना छोड़ देना?

नहीं-नहीं। तपस् का मतलब है — सही चीज़ को प्यार से चुनना। डर या दबाव से नहीं — अपनी भलाई की भावना से।

जैसे —

  • बाहर का तला-भुना छोड़ कर घर का सिंपल खाना चुनना
  • बिना ज़रूरत देर रात जागने की जगह समय पर सो जाना
  • बिना मतलब फ़ोन स्क्रॉल करने की जगह थोड़ा मेडिटेशन करना

ये सब कोई सज़ा नहीं है —ये खुद से किया गया एक वादा है।

एक बार खुद से पूछो
“जो मैं रोज़ करता हूँ — क्या वो मुझे और अच्छा बना रहा है, या बस वहीं अटका कर रखा है?”

हर दिन के छोटे-छोटे “तपस्” क्या हो सकते हैं?

  • रोज़ सुबह जल्दी उठना और देर रात तक न जागना — चाहे थोड़ा मुश्किल लगे
  • जब ऐसा लगे की पेट भर गया हो तब और कितनी भी अच्छी चीज़ क्यों न हो मना करना
  • रोज़ सिर्फ़ 5 मिनट चुपचाप बैठना — चाहे दिमाग़ दौड़ रहा हो
  • जब मन बिल्कुल भी नहीं कर रहा —तब भी अपने काम या परिवार के साथ खड़े रहना।

यही छोटी-छोटी चीज़ें, अगर रोज़ करो — तो बनता है एक मजबूत, शांत और टिके रहने वाला मन।

तपस्एक जादू जैसी चीज़ है जो सबके पास नहीं होती।

जो लोग ज़िंदगी में आगे बढ़ते हैं —चाहे वो सेहत हो, प्यार हो, काम हो या ध्यान वो हमेशा सबसे टैलेंटेड नहीं होते।

लेकिन वो हर दिन थोड़ा-थोड़ा करते हैं। रुकते नहीं। हर दिन —हर हाल में— बस करते रहते हैं। बस वही है असली तपस्। बड़े-बड़े बदलाव की ज़रूरत नहीं है। बस अंदर की उस छोटी सी आग को रोज़ ज़िंदा रखना है — प्यार से, धीरे-धीरे।


4. स्वाध्याय (खुद को जानना)

क्या आपने कभी खुद से ये सवाल पूछे हैं?

  • “मैं बार-बार ऐसा ही क्यों करता हूँ?”
  • “मुझे गुस्सा क्यों आता है इन बातों पर?”
  • “मैं असल में हूँ कौन — इन सब नक़ाबों के पीछे?”

अगर ऐसे ख्याल कभी भी आपके मन में आए हैं —तो समझो स्वाध्याय शुरू हो चुका है।

तो स्वाध्याय होता क्या है?

बिलकुल आसान भाषा में:

  • खुद को समझना — अपनी आदतें, अपनी हरकतें, अपने रिएक्शन
  • अच्छी किताबें पढ़ना — जैसे ऋषि पतंजलि का योग सूत्र, उपनिषद, भगवद गीता, या कोई भी   ऐसी किताब जो आप के मन के अंदर की अच्छाई को जगा दे
  • थोड़ी देर चुप बैठकर खुद को देखना — बस मन को दूर से देखना, बिना कोई फ़ैसला किए।

ये सब ऐसा है जैसे आईने में चेहरा देखते हो, वैसे ही अपने मन को देखना — कि अंदर क्या चल रहा है, सच में।

ये ज़रूरी क्यों है?

क्योंकि जब तक आप खुद को नहीं समझते, तब तक आप दुनिया को भी पूरी तरह नहीं समझ सकते। आपको हो सकता है — सारे नए फोन, शेयर बाज़ार के ट्रेंड्स, या फिल्मी गपशप की खबर हो —लेकिन अगर आपको ये नहीं पताकि आप गुस्सा क्यों होते हो, डरते क्यों हो, या बार-बार बेचैन क्यों हो जाते हो — तो बाकी सब ज्ञान अधूरा है।

स्वाध्याय क्या करता है?

ये अंदर एक रौशनी लाता है — और जब मन में रौशनी होती है, तब उसी रौशनी में आप को खुद को पूरी तरह से जानने की क्षमता मिलती है।

रोज़ाना स्वाध्याय कैसे करें?

आपको ना तो किसी पहाड़ की गुफा में बैठना है, ना ही दिनभर शास्त्र पढ़ते रहना है।

बस कुछ छोटे-छोटे तरीक़ों से शुरुआत करें:

i) रोज़ कुछ लिखो (Journal बनाओ)

हर रात एक छोटा सवाल खुद से पूछो: "आज मुझे सबसे ज़्यादा क्या महसूस हुआ — खुशी, चिड़चिड़ापन, डर, या शांति?"लेकिन क्यों ऐसा महसूस हुआ? बस लिखो — बिना काट-छांट किए। सिर्फ जो आपका मन कहता है। 

ii) ध्यान दोकौन सी चीज़ें आपको परेशान करती हैं?

कौनसी बातें या लोग आपकी एनर्जी चूस लेते हैं? कौन आपको अंदर ही अंदर थका देते हैं? कोई दोष मत दो। बस देखो। बस समझो।

iii) रोज़ कुछ अच्छा पढ़ो

कोई अच्छी किताब हो या कोई सीधा-सादा ब्लॉग — बस एक पैराग्राफ भी पढ़ लो, तो भी मन का रास्ता थोड़ा बदल सकता है।

iv) हर रात 5 मिनट चुप बैठो

खुद से पूछो: आज मैंने अपने बारे में क्या सीखा?”

और अगर जवाब कुछ अच्छा ना लगे — तो भी डरने या दुखी होने की कोई ज़रूरत नहीं।

स्वाध्याय का मतलब खुद को जज करना नहीं होता। मतलब सिर्फ़ ये है कि आप खुद को देखना शुरू करो। क्योंकि जब तक आप देखोगे नहीं, तब तक बदलोगे कैसे? कमरे की सफाई तभी हो सकती है जब लाइट ऑन हो।

स्वाध्याय और शब्दों की ताक़त

पुराने समय में स्वाध्याय का मतलब सिर्फ़ खुद की आदतें देखना नहीं था — उसमें मंत्रों का उच्चारण करना, या धार्मिक श्लोकों को ज़ोर से पढ़ना भी आता था। शब्दों में ऊर्जा होती है। हर बार जब आप कोई मंत्र, कोई अच्छा विचार, या कोई शुभ बात दोहराते हो — तो आप अपने मन को साफ़ कर रहे होते हो।

क्यों?

क्योंकि शुद्ध शब्दों में ऊर्जा होती है। वे मन को शुद्ध करते हैं, दिल को कोमल बनाते हैं, और आपको बार-बार याद दिलाते हैं कि — आप असल में कौन हो। यहाँ तक कि हर दिन बस 'ॐ नमः शिवाय' जैसा कोई सीधा-सा मंत्र भी अगर आप जप लो —तो भी वो मन में एक गहरी शांति और जुड़ाव ले आता है।

तोआप कौन हो?

सिर्फ़ आपका नाम नहीं। सिर्फ़ आपकी नौकरी या शरीर भी नहीं। आप उससे कहीं ज़्यादा हो। और हर बार जब आप ‘स्वाध्याय ’ करते हो —आप अपने अंदर एक क़दम और गहराई में उतरते हो —उस असली 'आप' की ओर जो डर, शक या असफलता से कभी नहीं टूटता।

अब पाँचवां और आख़िरी नियम पूरा करें —'ईश्वर-प्रणिधान’ —यानी खुद को किसी बड़ी, भरोसेमंद शक्ति को सौंप देना।

5. ईश्वर-प्रणिधान (ईश्वर में समर्पण)

क्या कभी ऐसा हुआ कि आपने पूरी मेहनत कर ली…फिर भी बात नहीं बनी? या कभी ऐसा हुआ कि कोई अजनबी, कोई संयोग, या बस सही वक़्त पर किसी ने आपकी मदद कर दी? वही पल होते हैं जब हमें किसी बड़ी शक्ति की झलक मिलती है।

यहीं से ईश्वर-प्रणिधान की शुरुआत होती है — मतलब, जब हम खुद को किसी बहुत बड़ी शक्ति के हवाले कर  देते हैं। मानो, यही शक्ति ही हमारा ईश्वर है। 

पर 'हवाले कर देना' का मतलब क्या?

  • इसका मतलब कमज़ोर बनना नहीं है।
  • इसका मतलब हाथ पर हाथ धरकर बैठना नहीं है।
  • और ये भी नहीं कि “भगवान सब ठीक कर देगा” सोचकर कुछ ना करना।

ईश्वर-प्रणिधान का मतलब है:

  • पूरी सच्चाई से, पूरी मेहनत से, अपना काम करना
  • और फिर परिणाम को लेकर पागलपन छोड़ देना।

इसे ऐसे समझो:

आपने एक बीज बोया। उसे पानी दिया। धूप भी लगने दी…लेकिन क्या आप ज़ोर डाल सकते हो कि वो बीज अब जल्दी से उगे?

नहीं न। आप बस अपना हिस्सा निभा सकते हो — बाकी काम प्रकृति का है।

बस यही हैसमर्पण याईश्वर-प्रणिधान’।

तो फिर, ईश्वर-प्रणिधान को रोज की ज़िंदगी में कैसे जिएं?

i) कोई भी काम शुरू करने से पहलेउसे समर्पित कर दो।
चुपचाप मन में कह दो —
"मैं ये काम मेरे ईश्वर को समर्पित करता हूँबस वही इसका फल तय करेगा।"

ii) जब कभी नतीजे आपकी उम्मीद से कम हों —

तो बस एक पल रुको, और सोचो — 'क्या कोई और रास्ता होगा जो ज़्यादा अच्छा हो — जो मेरे लिए ज़्यादा सही हो?' क्या ब्रह्मांड ने मेरे लिए कुछ और बेहतर सोच रखा है?”

iii) जब कभी खोए-खोए से लगो, या रास्ता समझ में न आए — तो प्रार्थना करो।

सफलता के लिए नहीं — दिशा या स्पष्टता के लिए।

कह दो —
मुझे रास्ता दिखाओ। मैं तैयार हूँ चलने के लिए।

iv) कोई भी मंत्र जो दिल से जुड़ता हो — उसे धीरे-धीरे बोलो या मन में दोहराओ।

जैसे — 'ॐ' या 'ॐ नमः शिवाय'। ये मंत्र धीरे-धीरे मन की बेचैनी को शांत करती हैं।

अब सवाल — ये इतना ज़रूरी क्यों है?

क्योंकि चाहे आप कितने भी बुद्धिमान हों, चाहे कितने भी अमीर या ताकतवर क्यों न हों — हमेशा कुछ न कुछ ऐसा होगा जो आपके नियंत्रण के बाहर होगा।

समर्पण का मतलब हार मानना या काम छोड़ देना नहीं हैये तो डर और बेचैनी से आज़ादी का रास्ता है।

ये तो ‘मैं ही सब कुछ कर दूँगा’ वाली सोच को छोड़कर — अपने अंदर ये भरोसा मज़बूत करना है कि ‘अब ईश्वर देख लेगा, जो होगा अच्छा ही होगा’।

और अगर मैं ‘ईश्वर’ में विश्वास नहीं करता तो?

तो भी कोई बात नहीं। 

ईश्वर-प्रणिधान कोई धर्म नहीं है। ये बस इतना मान लेना है कि — आप अकेले सबसे अहम या सबसे ज़रूरी नहीं होदुनिया में और भी चीज़ें, लोग, और शक्तियाँ हैं जो मायने रखती हैं।

जब हम सोचते हैं कि "मेरे बिना कुछ नहीं होगा," या "सब मुझे ही समझे," तो हम अनजाने में खुद को ही दुनिया का केंद्र मान लेते हैं। यह सोच दुःख, निराशा और नियंत्रण की ज़रूरत पैदा करती है।

आप समर्पित हो सकते हो:

  • सच के लिए,
  • प्रेम के लिए,
  • करुणा के लिए,
  • अपनी अंतरात्मा के लिए
  • या फिर उस जीवन की रहस्यपूर्ण धारा के लिए — जो सबको बहा रही है।

बस — जीवन को बहने दो। जैसे ही आप पकड़ना छोड़ते होजीवन चलने लगता है। जब आप सच में समर्पण करते हो — तब आप कभी भी अकेले नहीं होते। कोई अदृश्य शक्ति — जो दिखती नहीं, पर सच में होती है — वही तुम्हें थामती है, रास्ता दिखाती है, और सहारा देती है।

यही है पाँचवां ‘नियम ‘— और पाँचों नियमों का सार भी। यानी कि जब हम ईश्वर में समर्पण करना सीखते हैं, तभी पहले चार नियम भी अपने आप समझ में आने लगते हैं — और अंदर की असली यात्रा वहीं से शुरू होती है।

‘नियम’ पर अंतिम विचार

तो ये थे योगी जीवन के पाँच नियम —हर दिन निभाने वाले आत्म-नियम:

  1. शौच – बाहरी और भीतरी स्वच्छता
  2. संतोष – जो है, उसमें सहज आनंद
  3. तपस् – रोज़ की छोटी-छोटी अनुशासन की आग
  4. स्वाध्याय – खुद को पढ़ना, खुद को समझना
  5. ईश्वर-प्रणिधान – उस अनदेखे हाथ में सब सौंप देना

यह हर एक नियम बहुत सीधा है — लेकिन बेहद ताक़तवर।

ये कोई बंधन नहीं हैं — ये ऐसे साधन हैं जो अंदर की शांति, धीरे-धीरे होने वाली तरक्की, और अंतरात्मा से गहरे जुड़ाव की राह दिखाते हैं।

और अब — इससे पहले कि हम इस भाग को पूरा करें — एक बार फिर से ‘सौच’ को नष्ट करने का मूल कारण 'सनक ' के बारे में बता दूँ।

क्या आपने कभी गौर किया है — कि ज़्यादातर दुख इस बात से नहीं आता कि क्या हुआ, बल्कि इस बात से आता है कि हम उसके बारे में क्या सोचते रहते हैं, कैसे उससे चिपके रहते हैं?

हाँ — ये ‘सनक’ ही असली कारण है।

और, ये सनक सिर्फ़ सफ़ाई, खाना या लोगों तक सीमित नहीं होती — ये “मैं सही हूँ”, “मेरी बात मानी जाए”, “मैं सबसे बेहतर दिखूं”, “लोग मेरी तारीफ़ करें” — यहाँ तक कि हमारा अहंकार, दूसरों को जज करना, ज़्यादा सोचते रहना, और “मैं ही आध्यात्मिक रूप से ऊँचा हूँ” — ये सब भी बारीक़ ‘सनक’ से ही पैदा होते हैं।

इसलिए ये “सही या बेहतर साबित करना” जैसे बारीकी से पकड़ लेने वाली सनक समझदारी नहीं होती — ये तो असल में अंदर की एक बेचैनी होती है — और झूठे घमंड को खो देने का डर।

ये सब मिलकर ही हमारे अंदर अदृश्य ज़ंजीरें बना देते हैं।

सच्चा ज्ञान शोर नहीं करता — वो ध्यान से सुनता है।

तो बस, अपने आप से एक छोटा सा सवाल पूछो —

“क्या मैं किसी बात को यूँ ही पकड़े हुए हूँ… बिना जाने?” क्योंकि सनक — चाहे वो कितनी भी शांत और छुपी हुई क्यों न हो — असल में अशुद्धि ही है।

‘नियम’ सिखाते हैं

  • देखभाल करो… पर नियंत्रण मत रखो।
  • अनुशासन रखो… लेकिन ज़िद नहीं।
  • प्यार रखो … पर घमंड नहीं।

अगले ब्लॉग में हम चलेंगे आसन’ और प्राणायाम’ की दुनिया में — जहाँ ये कोई शारीरिक कसरत नहीं हैं — ये तो शरीर, मन और आत्मा को एक सूत्र में बाँधने वाले गहरे आध्यात्मिक अभ्यास हैं।

तब तक — स्थिर रहो, स्पष्ट रहो, कोमल रहो — और जो अब आपके शांति के काम का नहीं है, उसे धीरे-धीरे छोड़ते रहो। अगर आप राजयोग मेडिटेशन को मुझसे व्यक्तिगत रूप से सीखना चाहते हो — या फिर इस कालजयी राह से सेहत, शांति और समृद्धि की ओर कोई मार्गदर्शन चाहते हो — तो निःसंकोच मुझसे संपर्क करो। मैं आपके साथ इस यात्रा पर चलने के लिए तैयार हूँ।


 

2 thoughts on “राजयोग / अष्टांग योग – पतंजलि के योगसूत्र से शांति, सुख और समृद्धि कैसे पाए – भाग 2: नियम

  1. पुनः एक आनंद, मैं ये “नियम॰ प्रातः ही पढने वाला था, हमेशा की तरह किंतु ये ना हो सका और जब मैं पूरा दिन अपना काम करके बाहर से आकर कार पार्क किया तो ख्याल आया की क्यो ना अभी ही पढ़े और मैं कार के अंदर ही शाम 7:36 पे शुरू किया और 8:08 सन्ध्या पे आख़िरी पंक्ति का अंत हुआ। एक बार पढ़ना शुरू होता है आपकी लेखनी तो फिर जब तक समाप्त ना हो जाए तब तक रुकना संभव ही नहीं, क्यो की इतना सरल, रोचक और ख़ुद को उसमे जोड़ लेना!
    बहुत खूब।
    मुझे नहीं पता की आपके ब्लॉग से कितने लोगो के जीवन पर असर पड़ा है पर ये मुझे कहने में कोई संकोच नहीं की मेरे जीवन में इसका खूब खूब प्रभाव पड़ा है 🙏
    एक जगह आपने (RS1) लिखा है, इसका तात्पर्य ?
    और अंत में आपको खूब खूब शुभेच्छा और आभार 🙏
    अगले अध्याय के प्रतीक्षा में …

    1. आपके शब्दों ने बहुत प्रेरणा दी। हार्दिक आभार! ‘RS1’ सिर्फ एक एडिट नोट था। इतनी शुक्ष्मता से पढ़ने के लिए फिर से आभार।

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