Recap:
क्रोध या गुस्सा क्या है?
गुस्सा या क्रोध इंसान के असंतोष की एक ऐसी भावना है जो जितनी बढ़ती है उतना ही शरीर और मन का सर्वनाश होता है।
क्रोध दूर करने की तैयारी :
आपकी कठोर प्रतिज्ञा। और वह यह है कि – ‘जो कुछ भी हो जाए, मेरे साथ, मेरे आस पास, मेरे परिवार के सदस्यों के साथ – राजनीतिक, सामाजिक या कुछ भी, मैं कभी भी क्रोध नहीं करूंगा, किसी भी हालत में नहीं। गाली देने से भी नहीं और मारने पीटने से भी नहीं।‘
क्रोध दूर करने का पहला उपाय :
1. कम बोलो।
अब इस ब्लॉग में:-
आगे बढ़ने से पहले, मैं आपको एक ज़रूरी बात बताना चाहता हूं कि मैं यहां सिर्फ वही तरीकें बताऊंगा जिन्हे अपनाकर मैंने अपना गुस्सा दूर किया। इंटरनेट पर आपको हजारों तरीके मिल सकते हैं। उनमें से कुछ मेरे तरीकों से मेल भी खा सकते हैं, लेकिन निश्चित रूप से सभी नहीं। इसलिए, जो कुछ भी यहाँ मैं बोल रहा हूँ, वह मेरे लिए पूरी तरह से साबित किया हुआ सच है।
तो आओ भगवद गीता से शुरू करते हैं:
गुस्सा कहां से आता है और इसके बाद क्या होता है? यह गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
(गीता: अध्याय 2, श्लोक 62-63)
ध्यायतो विषयान्पुंस: सङ्गस्तेषूपजायते |
सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते || 62||
क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम: |
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति || 63||
(ध्यायतः विषयान् पुंसः संगः तेषु उपजायते |
संगात् सञ्जायते कामः कामात क्रोधः अभिजायते || 62
क्रोधात् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृति विभ्रमः|
स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाश: बुद्धिनाशात् प्रणश्यति|| 63)
सांसारिक मामलों में उलझ जाने से लगाव पैदा होता है,
और लगाव से 'काम' यानी 'इच्छा' पैदा होती है, काम से क्रोध,
क्रोध से मानसिक विकार और मानसिक विकार से 'स्मृतिभ्रम',
स्मृतिभ्रम से बुद्धिनाश, और बुद्धिनाश से पतन होता है।
मतलब:
जब इंसान सांसारिक मामलों में उलझ जाता है, तो उसे उन्ही चीज़ों से बहुत ज्यादा लगाव हो जाता है और उस लगाव के होते रहने से इंसान में बहुत सी जायज़ नाजायज़ इच्छाएं (काम) पैदा हो जाती हैं। और ऐसी इच्छाओं को पूरा न कर पाने से मन में क्रोध आता है। और जब क्रोध से मन भरा रहता है तो मानसिक अस्थिरता पैदा होती है, मानसिक अस्थिरता से 'स्मृति भ्रम' होती है, स्मृति भ्रम होने से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि का नाश होने से इंसान का ‘पतन’ होता है।
यहाँ, 'स्मृति भ्रम' का अर्थ है सही सोच का न होना, और 'पतन' का अर्थ है जीवन का दुःख से भर जाना।
हम कई बार कहते हैं की 'गुस्से से इंसान अँधा हो जाता है'। यह सच है। क्यों की गुस्से के समय इंसान कुछ भी चीज़ सही तरीके से नहीं सोच सकता है। और सब गलत कर बैठता है।
यह गीता के अनुसार जीवन के मानसिक प्रवाह के पहलू के साथ मेल खाता है।
क्या आप को पता है कि शरीर में क्रोध के कारण सबसे ज्यादा नुकसान कहाँ होता है?
क्रोध से जिगर या लिवर को सबसे ज्यादा नुकसान होता है। और हम सभी जानते हैं कि लगभग पूरे मानव शरीर को जिगर नियंत्रित करता है।
इसका मतलब है कि गीता की यह बात पूरी तरह से सच है: "क्रोध से इंसान का ‘पतन’ होता है।"
मैंने अपने पिछले ब्लॉग पोस्ट में बताया है कि जब इच्छाएँ पूरी नहीं होती हैं, तब मानसिक तनाव बढ़ता है, और फिर उस से पैदा होता है 'क्रोध'। और इन्हीं इच्छाओं से हमारे अंदर सभी दोष पैदा होते हैं – शारीरिक और मानसिक दोनों।
इसलिए, क्रोध को दूर करने के लिए सबसे पहले मानसिक तनाव को कम करना होगा। और मैंने अपने पिछले ब्लॉग में ‘मानसिक तनाव’ या ‘स्ट्रेस’ को दूर करने का उपाय बताया।
उफ़! तो, गुस्से को कैसे दूर करें?
देखो, यह जो आप ने "उफ़!" कहा न, यही तो है ‘स्ट्रेस’। अगर आप थोड़ी देर और धीरज नहीं रख सकते, तो आपको गुस्सा आ जायेगा। ऐसा कभी होने मत दो।
ठीक है, इस मुख्य सवाल का जवाब देने से पहले, मैं गुस्से को दूर करने से जुड़े इसी तरह के कुछ और सवाल जोड़ता हूं, जो कई लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं। और फिर, जब आप मेरा पूरा लेख पढ़ोगे, तब आपको इन सभी सवालों के जवाब एक साथ मिल जाएंगे।
1) मैं गुस्से को नियंत्रित करने के लिए कई अलग-अलग तरीके आजमा रहा हूं, फिर भी मुझे लगता है कि मैं पहले से ज्यादा गुस्सैल हो रहा हूं। क्यों?
2) मैंने गुस्सा और तनाव को नियंत्रित करने की कक्षाओं में, श्वास अभ्यास और प्राणायाम का अभ्यास किया है, और अभी भी करता हूं। लेकिन अब घर में सभी कहते हैं कि मैं पहले से जल्दी और बार बार गुस्सा हो जाता हूं। मैं कहां और क्या गलत कर रहा हूं?
3) मैं गुरुजी के आश्रम जाता हूं, गुरुजी की बात सुनता हूं, लंबे समय तक ध्यान करता हूं, और गुस्से को नियंत्रित करने के सभी तरीके आजमाता हूं जो मुझे गुरूजी बोलते हैं या इंटरनेट पर मिलते हैं। मैं दूसरों को भी इन तरीकों को आजमाने के लिए कहता हूं, लेकिन हम में से किसी को भी फायदा नहीं होता। इसका कारण क्या है?
4) सभी कहते हैं, "गुस्से में एक से दस तक गिनो या 'राम राम' कहो।" यह बिल्कुल काम नहीं करता है। गुस्से के समय, गुस्से के अलावा कुछ भी दिमाग में नहीं आता। तो, क्या यह तरीका गलत है, या मैं कुछ गलत कर रहा हूं?
5) मैं अपनी डायरी में लिखता रहता हूं कि मुझे गुस्सा क्यों आता है और जब मैं गुस्से में होता हूं तो मुझे क्या करने का मन करता है – "मुझे गुस्सा आता है अगर यह होता है, मुझे गुस्सा आता है अगर वह होता है, मुझे थप्पड़ मारने, लात मारने, किसी का सिर फोड़ने का मन करता है," आदि। अब ऐसा लगता है कि मैं हमेशा गुस्से से घिरा रहता हूं। चारों ओर सिर्फ गुस्सा और गुस्सा ही महसूस होता है। क्या मुझे यह बंद कर देना चाहिए? क्या कोई बेहतर तरीका है?
गुस्से के बारे में और भी कई सवाल हैं, लेकिन फिलहाल मैं यहीं पर ही ख़त्म करता हूँ।
अब मैं आपको बताता हूं कि साइकोलॉजिस्ट और साइकियाट्रिस्ट लोग कुछ चरित्र-आधारित जानकारी निकालते हैं और उस जानकारी के आधार पर गुस्सा , तनाव या और भी किसी किस्म के मानसिक रोग को ठीक करने के लिए विभिन्न तरीकों का सुझाव देते हैं। बहुत गंभीर मामलों में, वे दवाएं भी लिखते हैं। यह अच्छी बात है। मनोविज्ञान या चिकित्सा विज्ञान में कई अवधारणाएं हैं जो शायद सही हैं, लेकिन सही तरीका या सटीक दवा और उपचार सुझाना हमेशा संभव नहीं होता है।
उदाहरण के लिए: वजन बढ़ना या वजन कम होना।
आमतौर पर इसके दो आम कारण होते हैं – भोजन या स्ट्रेस। एक डॉक्टर कहेगा कि अपना भोजन सही करो – अगर वजन ज्यादा है तो कम खाओ, अगर वजन कम है तो ज्यादा खाओ। दूसरा डॉक्टर कहेगा कि मुख्य कारण स्ट्रेस है। तो वह स्ट्रेस की दवा और स्ट्रेस को दूर करने की सलाह देगा। फिर एक और डॉक्टर कहेगा – दोनों ज़रूरी है। स्ट्रेस को रोकना और खाने का नियम मानना।
मेडिकल साइंस में, इसे ‘मल्टीफैक्टोरियल कॉजेशन’ (multifactorial causation) कहा जाता है – जिसका मतलब है कि एक बीमारी के कई कारण होते हैं। यहां एक तीसरा कारण भी हो सकता है – अनुवांशिकता (genetic)। अगर पिता या माता के परिवार में किसी को यह है, तो यह आपको भी हो सकता है। तो, इस स्थिति में कौन सी दवा या विधि सही से काम करेगी? कहना मुश्किल है। केवल यही नहीं – यह एक चक्र बन जाता है, जैसे – तनाव के कारण ज्यादा खाना या कम खाना, जिससे वजन बढ़ता या घटता है, और फिर वजन बढ़ने या घटने से फिर से स्ट्रेस बढ़ जाता है।
मेडिकल साइंस यहां असफल नहीं होता, हालांकि, वास्तव में, कई मरीज ठीक नहीं होते हैं। मैं कई मोटापे से ग्रस्त लोगों को जानता हूं जो वजन कम करने के लिए जिम जाते हैं और ज्यादा खाते हैं – क्योंकि अगर आप जिम जाते हो, तो आपको थोड़ा ज्यादा खाना पड़ता ही है, है ना? तो, बस, फिर तो बात ही क्या है! वे तनाव के लिए प्राणायाम और मेडिटेशन भी करते हैं। लेकिन कुछ काम नहीं आता। दूसरी ओर, जो पतले और तनावग्रस्त होते हैं वे भी अधिक खाते हैं और जिम जाते हैं, लेकिन तनाव के कारण उनके लिए कोई भी चीज़ कुछ भी काम नहीं करती।
बाजार में वजन कम करने के लिए कई विज्ञापन हैं – जो "पहले" और "बाद में" की तस्वीरें दिखाते हैं एक आदमी या औरत की। सच मानो तो, ये सब झूठ होते हैं। वे सभी फोटोशॉप में एडिट की जाती हैं ताकि परिणामों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा सके, जिससे ऐसा लगता है कि व्यक्ति ने इतने थोड़े समय में इतना ज्यादा वजन कम किया है, जबकि वास्तव में यह सिर्फ डिजिटल हेरफेर है, और फोटो में व्यक्ति को विज्ञापन कंपनी से अच्छा पैसा मिल जाता है।
गुस्से की समस्या बिल्कुल वैसी ही है। शायद उससे भी ज्यादा। व्यक्तिगत मानसिकता, अनुवांशिक मानसिकता, वर्तमान तनाव, आहार, सामाजिक पहलू – जब ये सभी मिलते हैं, तो आप गुस्से के लिए कौन सी दवा लोगे और कौन से तरीके अपनाओगे?
इधर उधर के सभी तरीके? गलत व्यायाम? गलत प्राणायाम? गलत ध्यान? एक से दस तक गिनती? राम राम? डायरी में लिखना?
कुछ भी काम नहीं करेगा। यह काम कर ही नहीं रहा है, जैसा कि आप ऊपर बताए गए सवालों से देख सकते हो। केवल वे लोग जो सही तरीके से आगे बढ़ते हैं और सही तरीकों का उपयोग करते हैं, तनाव और गुस्से को नियंत्रित कर रहे हैं। अन्य केवल इधर-उधर भटक रहे हैं, अपना गुस्सा बढ़ा रहे हैं।
तो, सही तरीका क्या है?
मैं यह नहीं कहूंगा कि यह सही है या गलत, लेकिन मैं आपको यह फिर से याद दिला दूँ कि इन सरल तरीकों का पालन करके, मैंने अपने गुस्से को नियंत्रित किया है, और कई अन्य लोगों ने भी इससे बहुत लाभ पाया है और पा रहे हैं। अब मैं उन्हें साझा करूंगा। इनमें से कोई एक या दो करने से नहीं होगा; आपको सभी को एक साथ करना होगा। और तभी फल मिलेगा।
1) कम बोलो – जितना कम आप बोलोगे, उतना ही कम गुस्सा आएगा। इस आदत की शुरुआत करने के लिए, खाने की मेज पर चुप रहो । यदि आप अकेले रहते हो या अकेले खाते हो, तो फोन पर बात करते समय या किसी विषय पर चर्चा करते समय इस आदत का अभ्यास करो। पूरे दिन, कुछ भी कहने से पहले, अपनी उंगली को होठों पर रखकर रुको और फिर सोचकर बोलो। शुरू में यह अजीब और समय लेने वाला लग सकता है, लेकिन बाद में यह आदत बन जाएगी।
2) मंद-मंद मुस्कान का अभ्यास करो – हमेशा, कारण हो या न हो। उस मुस्कान को अपने चेहरे पर रखते हुए, उन स्थितियों या शब्दों के बारे में सोचो जो आपको गुस्सा दिलाते हैं। क्या आप वास्तव में उन स्थितियों को संभाल सकते हो? हर समय याद रहे की उन गुस्सा दिलाने वाली स्थितियों के बारे में सोचते समय भी आप के चेहरे पर से वह मुस्कान चली न जाये। अगर मुस्कान चली गयी, तो सब व्यर्थ हो जाएगा। यह अभ्यास करते करते जिस दिन आपका परिवार या दोस्त आपको हमेशा मुस्कुराने के लिए पागल कहेंगे, वह दिन आपके सफलता का पहला दिन होगा।
3) KYC करो – बैंक में, नया खाता खोलते समय, वे 'KYC' की मांग करते हैं जिसका मतलब है Know Your Customer (अपने ग्राहक को जानो)। बैंक जानना चाहता है कि आप कौन हो, आप कहां रहते हो, आदि, इसलिए वे आपकी प्रमाणित पहचान पत्र मांगते हैं जिसमें आपकी फोटो होती है। जैसे आधार कार्ड और पैन कार्ड। यहां, मेरी थ्योरी में, KYC का मतलब है Know Yourself Completely (स्वयं को पूरी तरह से जानो)। यदि आप खुद को पूरी तरह से नहीं जान पाते हो, तो गुस्से को नियंत्रित करना असंभव होगा।
इस संदर्भ में, मैं कहना चाहता हूं, और मैं आगे भी कहता रहूंगा:
जो चाहे करो, लेकिन किसी भी चीज़ के प्रति जुनूनी न बनो।
जुनून भी गुस्से का एक कारण है, और लगातार जुनून ओसीडी (OCD - ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर) का कारण बन सकता है।
उदाहरण के लिए, कोई आपको बताता है कि एक इंसान बुरा है – और आप बिना जांच पड़ताल किए उस बात को मन में धर लेते हो कि वह इंसान बुरा ही है। इसके विपरीत, यदि कोई आपको बताता है कि एक इंसान अच्छा है, तो आप इसे भी मन में धर लेते हो कि वह इंसान अच्छा ही है। जब कोई और इसे खंडित करता है, तो आपको गुस्सा आता है। आप सोचते हो, "वह क्या कह रहा है? क्या मैं बेवकूफ हूँ? क्या मुझे कुछ भी समझ नहीं आता? मैं उसकी आँखों में ऊँगली डाल कर दिखा दूंगा की वह गलत है।" किसी को 'गलत' साबित करने की यह इच्छा वास्तव में गुस्सा नियंत्रण में बहुत खतरनाक चीज है।
राजनीति में, समर्थक चाय या कॉफी की दुकानों, होटलों, ट्रेनों, स्टेशनों, बसों, बस स्टैंड और कई अन्य स्थानों पर ऐसे जुनून को बढ़ावा देकर गुस्से को जनम देते हैं और इस गुस्से को अपने अंदर पालने लगते हैं। वे जो टीवी पर देखते हैं या समाचार पत्रों में पढ़ते हैं, उसे सच्चाई के रूप में मान कर मानो जैसे अपने खून में ही शामिल कर लेते हैं। यह व्यवहार बहुत से शिक्षित और अशिक्षित सभी में समान है – वे सभी जुनून के प्रभाव में रहते हैं।
क्या आप इसे किसी को समझाने की कोशिश करोगे? सावधान! अगर आप ऐसा करते हो, तो बहसें होंगी, और यह लड़ाई तक भी जा सकता है। इसलिए, अपने आप को सुधारने पर ध्यान दो और दूसरों को अपने हाल पर छोड़ दो। मुझे मालूम है कि आप ज्ञान का अमृत फैलाना चाहते हो – लेकिन एक घातक विष से भरे एक बड़े कलश में, आप का यह एक बूंद अमृत कोई काम नहीं आएगा। इसलिए, उस बूंद को बहुत ही थोड़ी विषैली स्थिति के लिए बचा कर रखो।
अब बताता हूँ कि KYC कैसे करोगे।
खुद से पूछते रहो कि आप कौन सा काम कैसे करते हो, आप दूसरों से कैसे बात करते हो – क्या आप अपने बहुत ही करीबी लोगों के साथ जिस तरह बर्ताव करते हो ठीक उसी तरह क्या पड़ोसियों या अजनबियों के साथ बर्ताव करते हो? क्या जो बर्ताव आप को अच्छा नहीं लगता है वही क्या आप दूसरों के साथ करते हो? किसी विषय के बारे में आप को पूरा ज्ञान न होने के बावजूद भी क्या आप उसी विषय पर दूसरों को ज्ञान देने लग जाते हो?
मैं अनगिनत लोगों को बिना किसी उचित शिक्षा के एक शिक्षक, डॉक्टर, वकील की तरह व्यवहार करते हुए देखता हूँ। हर कोई सब कुछ जानता हुआ लगता है। असली डॉक्टर या वकील मुफ्त में बात नहीं करते – क्योंकि वे अपने ज्ञान का मूल्य समझते हैं, जबकि ये बिना सही जानकारी वाले लोग उपदेश देने और तर्क वितर्क करने में खुद को जैसे माहिर समझते हैं।
आप ऐसा कभी न करो। हमेशा खुद अपने ज्ञान को जांच लो और फिर सिर्फ ज़रूरत पड़ने पर ही बोलो।
आप किस तरह की अनावश्यक बातें करते रहते हो? दिनभर में कितनी बेकार की बातें आप करते हो जो आपको लगता है की ये ज़रूरी हैं? जैसे – "अगर वैसा न करते तो बेहतर होता", "अगर ऐसा होता तो वैसा होता या वैसा न होता " – ये सब 'अगर', 'होता', 'हो सकता था' वाली सभी बातें बेकार की होती हैं। तो ये सब बोलना बिलकुल बंद करना होगा।
यदि आप उपरोक्त सभी का अभ्यास करते हो, तो आप अपनी खुद की गलतियाँ खुद ही ढूंढ पाओगे।
ज्ञान और अज्ञानता के संबंध में, विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात ने एक बार कहा:
"मैं सबसे बुद्धिमान जीवित एक व्यक्ति हूँ, क्योंकि मुझे एक चीज़ का पता है, और वह यह है कि मुझे कुछ नहीं पता।"
खुद को सर्वज्ञ समझने वाले लोगों के इस वर्तमान समाज में, सुकरात की इस बात को हमेशा याद रखना और इसके अंदर के अर्थ को समझने की कोशिश करना। फिर अपने अंदर एक उत्तम चरित्र को पाने में आपको बिलकुल देर नहीं लगेगी।
4) अपने अंदर हमेशा एक खुशी की भावना बनाए रखो –
आपके चेहरे पर वह मंद मंद मुस्कान आपको खुशी की भावना बनाए रखने में मदद करेगी। चाहे कुछ भी हो जाए, उस मुस्कान और भावना को फीका न पड़ने दो। मान लो कि एक पुलिस कार आपको रोकती है क्योंकि आपने ट्रैफिक सिगनल नहीं देखा और आपको जुर्माना हो जाता है। इस स्थिति में भी, चेहरे पर से अपनी मुस्कान और खुशी को गायब न होने दो।
कितनी बेकार की बात है यह! ऐसी हालत में, थोड़ा गुस्सा तो होगा ही। कुछ लोग कहते हैं कि गुस्से का एक सकारात्मक पक्ष भी है। मिसाल के तौर पर, ऑफिस में एक सीनियर अपने जूनियर को डांटता है, और वह जूनियर, जो इतनी देर तक या इतने दिनों तक काम नहीं कर रहा था, अचानक काम पूरा कर देता है। क्या यह गुस्से का सकारात्मक पहलू नहीं है?
नहीं, बिल्कुल नहीं। लेकिन हाँ, यह सच है कि आपके गुस्से के कारण आपका काम जल्दी हो गया। लेकिन, सच बताऊं तो: यदि आप किसी भी कारण से एक सेकंड के लिए भी गुस्सा होते हो, तो यह समय के साथ विभिन्न तरीकों से अपने अंदर बढ़ता रहेगा। वास्तव में, जब आप एक अच्छे कारण के लिए थोड़ा गुस्सा महसूस करते हो, जैसे कि दूसरों को जल्दी से काम पूरा करने के लिए उकसाना, तो आपका अवचेतन मन उस गुस्से को उसी क्षण से और भी बहुत सी जगह पर बहुत से तरीके से और भी बहुत ज्यादा कर के दिखाने के लिए तैयार हो जाता है। मनोविज्ञान में, इसे ‘Anger Escalation’ ('गुस्से की वृद्धि') कहा जाता है।
तो, क्या इसका मतलब है कि बहुत ज़रूरी होने पर भी पिता पुत्र को, शिक्षक छात्र को, सीनियर जूनियर को कभी भी गुस्से से नहीं डांटेगा?
नहीं, बिल्कुल नहीं।
लेकिन हाँ। यदि बहुत ज़रूरी हो, तो आप केवल एक कुशल अभिनेता की तरह गुस्सा दिखा सकते हो – झूठा गुस्सा, जो पूरी तरह से एक अभिनय होना चाहिए और कुछ नहीं। तब भी, आपके चेहरे पर की मुस्कान आपके मन में छिपी रहनी चाहिए।
यदि आप इसे सही तरीके से कर सकते हो, तो आप यह पक्का जान लो कि आप अपने गुस्से पर विजय पाने की राह पर हो।
यहाँ पर एकबार फिर से वह वाली बात याद दिला दूँ:
“जो चाहे करो, लेकिन किसी भी चीज़ के प्रति जुनूनी न बनो।”
5) एक मंत्र बनाओ या कोई बनाया हुआ मंत्र जपो –
कुछ सरल शब्द चुनो जिनका बहुत सकारात्मक अर्थ हो। फिर, दिन-रात उसे जपो। नहीं, सोते समय नहीं। हालांकि, जब आप इसे अच्छी तरह से अपना लोगे, तो मंत्र सोते समय भी चलता रहेगा। बाद में, यही आपका मंत्र मैडिटेशन बन जायेगा। मैंने अपने पहले के ब्लॉग 'मैडिटेशन क्या है?' में बताया है कि मंत्र क्या होना चाहिए।
फिर से यहाँ भी थोड़ा बता देता हूँ। ये कभी भी मत बोलो:
"मुझे गुस्सा नहीं आएगा," "गुस्सा, दूर हो जाओ," "मैं गुस्से में नहीं हूँ" – ये सभी नकारात्मक हैं और इनको बोलते रहने से आपका गुस्सा दिन-ब-दिन बढ़ता जाएगा।
जो शब्द मंत्र हो सकते हैं वे हैं:
"मैं (बहुत) शांत हूँ।" "हे, दयालु प्रभु!" "मन, शांत हो जाओ" – ये सभी बहुत सकारात्मक हैं।
पहले से बनाया हुआ मंत्र आप को शास्त्रों में मिलेगा।
'ॐ नमः शिवाय'
'अल्लाह हू अकबर'
'मा-रा-ना-था'
किसी खास काम के दौरान, जहां आप को पूरा ध्यान देना पड़ता हो, वहां मंत्र जप न करो, जैसे:
- किसी प्रोजेक्ट में आंकड़ों के हिसाब करना
- मरीज की नाड़ी जांचना
- छात्रों को पढ़ाते हुए उनसे पाठ के बारे में बातचीत करना
- किसी मशीन को चलाना जिसमें दोनों ही हाथ लगते हों
हालांकि, बहुत ही पहचान के रोज के रास्ते पर गाड़ी चलाते समय मंत्र जप कर सकते हो। अनजान रास्ते में बिलकुल नहीं।
मंत्र जप तीन तरीकों से किया जा सकता है: आवाज के साथ बोल कर (वाचिक), फुसफुसाकर (ओष्ठिक), और मन के अंदर (मानस)। ‘मानस’ जप को सबसे अच्छा माना जाता है, इसलिए आपको उसका अभ्यास करना होगा। गले में ‘विशुद्ध चक्र’ होता है, जहाँ आपको बिना जीभ, होंठ और जबड़े को हिलाए चुपचाप मंत्र का उच्चारण करना होगा। थोड़ा सा अभ्यास करोगे तो यह आ जायेगा।
6) अपने गुस्से की डायरी लिखो –
इस डायरी में लाइन से यह चीज़ें लिखो:
तारीख: गुस्से का समय: गुस्से की अवधि: गुस्से का कारण:
इस डायरी में लिखते समय अपने आप से बहुत ईमानदार रहो क्योंकि यह आपके अपने लाभ के लिए है, न कि किसी और को दिखाने के लिए। जिसके ऊपर आपको गुस्सा आया हो उस इंसान का नाम ज़रूर लिखो चाहे वह कोई भी हो। अगर आपको सपने में गुस्सा आया हो और आप जाग जाते हो, तो इसे डायरी में नोट करो। अगर आप सपना भूल जाते हो, तो कोई बात नहीं और अच्छी नींद हुई ऐसा सोच लेना, जो कि अच्छी बात भी है। लेकिन यह हर रात नहीं होना चाहिए क्योंकि अगर आप हफ्तों तक हर रात सपनों को याद नहीं कर पाते या आपको लगता है कि आप कभी सपने नहीं देखते हो, तो आप मान लो कि आप को नींद विकार (Sleep Disorder) हुआ है जो की अच्छी बात नहीं है। सही तरीके से किया मेडिटेशन नींद विकारों में काफी मददगार है।
बहरहाल, यह डायरी आपको स्पष्ट रूप से समझने में मदद करेगी कि आपकी गुस्से को नियंत्रित करने की क्षमता में सुधार हो रहा है या नहीं।
7) हमेशा वर्तमान में रहो –
सुबह उठने से रात को सोने तक, हर समय जो कुछ भी कर रहे हो उस पर खास ध्यान दो और वो सब ठीक उसी समय बोलते रहो। जैसे –
"मैं जाग गया हूँ। मैं बिस्तर से उठ रहा हूँ। मैं बाथरूम जा रहा हूँ। अब मैं अपने दांत ब्रश कर रहा हूँ।"
आप इसे और भी बारीकी से बोल सकते हो, जैसे –
"मैं टूथब्रश उठा रहा हूँ। मैं टूथपेस्ट का ढक्कन खोल रहा हूँ। मैं ब्रश पर टूथपेस्ट लगा रहा हूँ। अब मैं अपने दांत ब्रश कर रहा हूँ – ऊपर और नीचे।"
जितना आप बारीकी से बोलोगे उतना ही सब काम धीमी होता जायेगा और यह अच्छी बात भी है। इसके रिजल्ट्स जल्दी देखने को मिलेंगे । लेकिन, अगर आपको लगता है कि आपको ऑफिस या किसी काम के लिए देरी हो जाएगी, तो बारीकी से न बोल कर सीधा सीधा बोलते रहना। लेकिन धीरे-धीरे बारीकी से बोलना प्रैक्टिस करना होगा।
यह मानसिक एकाग्रता के लिए भी बहुत ज़रूरी है।
8) सुबह उठने के बाद और रात के खाने के बाद सैर करो –
कम से कम 20 मिनट। हमेशा याद रखो कि यह न केवल गुस्से को दूर करने के लिए बल्कि आपके सामान्य स्वास्थ्य के लिए भी बहुत ज़रूरी है। धीरे-धीरे चलो और हर चार कदमों के साथ श्वास लो और अगले चार कदमों के साथ श्वास छोड़ो। और श्वास छोड़ते समय ही मंत्र जपो।
सावधान! मैंने अपने पिछले ब्लॉग पोस्ट में लिखा था कि मंत्र केवल श्वास छोड़ते समय ही जपें। श्वास लेते समय नहीं। और न ही श्वास रोक कर।
9) पर्याप्त और अच्छी नींद लो –
यदि आप 25 से ऊपर और 50 से कम हो, तो आपको कम से कम 8 घंटे की नींद चाहिए, और यदि आप 50 से ऊपर हो, तो कम से कम 6 घंटे। लेकिन अगर आप सही तरीके से मेडिटेशन करते हो और महसूस करते हो कि इस से कम समय सोने पर कोई तकलीफ़ नहीं होती, तो कोई बात नहीं है। और अगर आपको लगता है कि आपको इस से ज्यादा नींद की ज़रूरत है, तो ज़रूर ज्यादा सोना। नींद की कमी हानिकारक है। हालाँकि, खोई हुई नींद की पूर्ति की जा सकती है। इसका मतलब है कि अगर आप एक दिन 2 घंटे कम सोते हो, तो अगले दिन 2 घंटे ज्यादा सोने से आप की नींद की जो कमी थी वह पूरी हो जाएगी। चिकित्सा विज्ञान में इसे 'स्लीप डेट' (Sleep Debt) या 'स्लीप डेफिसिट'(Sleep Deficit) कहा जाता है। लेकिन यह हमेशा नहीं होना चाहिए। अगर आप लगातार नींद की कमी से जूझते हो, तो यह आपके शरीर और दिमाग को नुकसान पहुंचाएगा। मानसिक तनाव और गुस्सा निश्चित रूप से बढ़ जाएगा। इसलिए, छुट्टियों के दिनों में, थोड़ी ज्यादा नींद लेने की कोशिश करो।
सोने से पहले और उठने के तुरंत बाद, कम से कम 5 मिनट के लिए मंत्र जपो। आप बिस्तर पर लेटे हुए भी मंत्र जप सकते हो। लेटते समय तकिया न लो।
10) ‘अष्टांग योग’ मेडिटेशन का अभ्यास करो –
अगर आप अपने अंदर से गुस्सा या क्रोध को पूरी तरह से समाप्त करना चाहते हो, तो आपको ‘अष्टांग योग’ ज़रूर करना पड़ेगा। मैंने पहले भी इसका उल्लेख किया है। यह एक प्रकार का योग है जो न केवल आपके गुस्से को, बल्कि आपके पूरे जीवन को बदल देगा! यह आपको मानव जीवन के सभी दुखों और कष्टों से परे ले जाएगा। गारंटी। लेकिन एक ही शर्त है – आपको इसे बिल्कुल सही तरीके से करना होगा।
यह एक बहुत बड़ा विषय है। इसलिए, मैं इसे इस ब्लॉग पोस्ट में पूरी तरह से कवर नहीं कर पाउँगा। लेकिन मैंने पिछले ब्लॉग पोस्ट में कहा था कि मैं इसे संक्षेप में समझाऊंगा। तो अब, इस पर ध्यान दो।
‘अष्टांग योग’ क्या है?

यह दरअसल ध्यान या मेडिटेशन की एक ऐसी विधि है जो आपके जीवन में सुख, शांति, धन, अच्छा स्वास्थ्य और अन्य सभी अच्छी चीजें ला सकती है। इसे सही तरीके से अभ्यास करने पर, एक समय ऐसा भी आ सकता है जब आप अपने साथ कल क्या होनेवाला है, इसका अनुमान लगा सकते हो।
लगभग 2200/2300 साल पहले, प्राचीन भारत में गौतम बुद्ध के बाद, महान ऋषि पतंजलि ने संस्कृत में इसके बारे में लिखा था। और यह पतंजलि के "योग सूत्र" के नाम से प्रसिद्ध है। फिर, 1896 में, स्वामी विवेकानंद ने इसे एक बहुत ही अर्थपूर्ण नया नाम दे कर लिखा – "राज योग" –और लोगों ने इसका अभ्यास भी किया। लेकिन धीरे-धीरे, राजनीतिक पतन, ईर्ष्या, नफ़रत, लालच और हिंसा के बढ़ने के कारण, ज्यादा तौर पर लोग इसे ठीक से नहीं अपना सके। और आज, लोगों की आर्थिक और मानसिक स्थिति इतनी बिगड़ती जा रही है कि अब लोगों को इसकी ज़रूरत फिर से पहले से ज्यादा महसूस हो रही है।

ऐसी स्थिति में, कुछ लोग गलती से इसी नाम की अन्य किताबें पढ़ रहे हैं। मैं यहाँ बता दूँ कि स्वामी विवेकानंद का "राज योग" सिर्फ एक ही है। बाजार में, आपको "राज योग" नाम की अन्य लेखकों की किताबें मिल सकती हैं। खरीदते समय थोड़ा देख कर खरीदें।
आजकल, कई लोग "योग" को सिर्फ शारीरिक व्यायाम के रूप में समझते हैं। इसलिए, कई लोग गलती से दक्षिण भारत के किसी व्यक्ति द्वारा लिखी गई एक किताब खरीदते हैं, पढ़ते हैं और अभ्यास भी करते हैं – वह है "अष्टांग विन्यास योग"। ऐसे कई अन्य भी हैं। इन सभी को लगभग 600 साल पहले लिखी गई "हठ योग" किताब से लिया गया है। लेकिन आप विवेकानंद का "राज योग" या पतंजलि के "योग सूत्र" खरीदते समय कभी गलती मत करना।
इसका असली कारण यह है कि आजकल लोग किसी भी प्रकार के शारीरिक व्यायाम को पसंद करते हैं। बढ़ती हुई 'जिम' इंडस्ट्री इसका प्रमुख उदाहरण है। मैं अक्सर देखता हूँ कि कई युवा लड़के और लड़कियाँ जिम जाना शुरू करते हैं और बहुत सारा पैसा खर्च करते हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश थोड़े समय बाद इसे छोड़ देते हैं। और तब यह लाभ की बजाय अधिक नुकसान पहुंचाता है। हालांकि, थोड़ा व्यायाम हमेशा शरीर के लिए अच्छा होता है; मेरी मानो तो चलना ही सब से अच्छा व्यायाम है।
"अष्टांग योग" या "राज योग" और "अष्टांग विन्यास योग" में क्या अंतर है?
अष्टांग योग ध्यान या मेडिटेशन करने का एक ऐसा तरीका है जो शरीर को किसी किस्म की तकलीफ़ पहुँचाए बिना शरीर और मन को स्वस्थ रखने का और जीवन को पूरी तरह से अच्छाई के तरफ बदलने का उपाय है।
और अष्टांग विन्यास योग शारीरिक व्यायाम का एक सेट है जिसमें शरीर को विभिन्न स्थितियों में तरोड़ मरोड़ कर रखना पड़ता है और अधिकतर मामलों में कुछ तकलीफ़ों के साथ ही करना पड़ता है ताकि शरीर स्वस्थ रहे। मेरे अनुभव में, इसका परिणाम अधिकांश मामलों में संतोषजनक नहीं होता।
अगर मैं और ज्यादा सरल कर के बोलूं तो : अष्टांग योग (राज योग) बहुत ही ऊँचे किस्म का ध्यान है। अष्टांग विन्यास योग सिर्फ शारीरिक व्यायाम है।
लेकिन, पक्के तौर पर, यह बहस का विषय हो सकता है क्योंकि अब दुनिया भर में लाखों संगठन योग व्यायाम को बढ़ावा दे रहे हैं। आजकल, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में योग व्यायाम के लिए डिग्री और डिप्लोमा भी दिए जा रहे हैं। बड़े शहरों के लगभग हर स्कूल में योग शिक्षक नियुक्त किए जा रहे हैं। योग शिक्षक लगभग हर घर में आ रहे हैं, या तो शरीर को स्वस्थ रखने के लिए या कुछ बीमारियों को व्यायाम के माध्यम से ठीक करने के लिए। यह योग व्यायाम लाखों लोगों के लिए नए आय के अवसर पैदा कर रहा है। इसलिए, मैं बहस नहीं करूंगा। मैंने सिर्फ वही कहा जो मैं अपने आसपास देखता हूँ।
वैसे भी, ये बातें बहुत ध्यान से समझी जानी चाहिए। ये व्यक्तिगत पसंद भी होती हैं। खैर जाने दो, हम तो यहाँ गुस्सा या क्रोध को दूर करने का उपाय सीख रहे हैं।
महर्षि पतंजलि के 'अष्टांग योग' के आठ अंग इस तरह हैं:
1) यम
2) नियम
3) आसन
4) प्राणायाम
5) प्रत्याहार
6) धारणा
7) ध्यान
8) समाधि
इनमें से कोई भी शारीरिक व्यायाम से संबंधित नहीं है; बल्कि, ये सभी मानसिक अनुशासन से जुड़े हैं।
यम – पांच सामाजिक अनुशासन का पालन करना इस में ज़रूरी है:
I) अहिंसा (हिंसा न करना),
II) सत्य (सच्चाई),
III) अस्तेय (चोरी न करना), * चोरी की परिभाषा बहुत ही लम्बी है।
IV) ब्रह्मचर्य (मन को ब्रह्म या परम सत्य की ओर ले जाना और सभी सांसारिक सुखों पर नियंत्रण रखना),
V) अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना और दूसरों की चीज़ों की इच्छा न करना)।
नियम – पांच व्यक्तिगत अनुशासन का पालन करना इस में ज़रूरी है:
I) शौच (शरीर और मन को शुद्ध रखना), सिर्फ नहा लेने से ही शरीर शुद्ध होगा; ऐसा नहीं है
II) संतोष (जो कुछ है उससे संतुष्ट रहना),
III) तप (धैर्य, सुख-दुख पर नियंत्रण और मानसिक संघर्ष में शांत रहना),
IV) स्वाध्याय (खुद से शास्त्रों को पढ़ना, अंतरात्मा से बातें करना, सब कुछ मन की गहराई या अंतर्दृष्टि से देखना),
V) ईश्वर प्रणिधान (ईश्वर के प्रति समर्पण – अच्छे या बुरे दोनों ही स्थिति में पूर्ण विश्वास और भरोसा रखना और सिर्फ सत्कर्म करना)।
आसन – शरीर को थोड़ी सी भी तकलीफ़ न दे कर लम्बे समय तक स्थिर बैठने की कोई भी एक मुद्रा है। आप को जैसा सही लगे वैसा ही बैठो बस ध्यान रहे आप की रीड की हड्डी यानि मेरुदंड सीधा रहे। ( यहाँ 'इड़ा' और 'पिंगला' का कुछ काम है जो हम बाद में सीखेंगे)
दरअसल यह मेडिटेशन के अलावा दूसरे समय भी काम आता है। इससे शारीरिक स्थिरता प्राप्त होती है।
प्राणायाम – अब जब आप सही तरीके से बैठना सीख ही गए हो, तो आप प्राणायाम का अभ्यास कर सकते हो। शूरु में, यह सिर्फ धीरे-धीरे सांस लेना और धीरे-धीरे सांस को छोड़ना होता है। बहुत ही धीरे धीरे। रीढ़ को सीधा रखना होगा। और आपको सांस लेने और छोड़ने की अवधि समान रखनी होगी। सांस को अंदर रोकना नहीं। मैं प्राणायाम की पूरी विधि अलग से समझाऊंगा, जिसमें पूरक (सांस लेना), कुम्भक (सांस रोकना), और रेचक (सांस छोड़ना) तीनो समझाऊंगा। लेकिन अगर आप सिर्फ यह शुरुआती स्तर के प्राणायाम का अभ्यास करते हो, तो भी आपको पूरा लाभ मिलेगा। आप किताबों या इंटरनेट पर देख सकते हो , लेकिन गलत रास्ता या तरीका अपनाना नहीं, क्योंकि बाजार में बहुत तरीके का प्राणायाम आप को मिल सकता है। अगर आप को कोई भी दुविधा हो तो सिर्फ स्वामी विवेकानंद के 'राज योग' को ही अपनाओ। प्राणायाम के कई लाभ हैं, लेकिन इसे गलत तरीके से करने से हानि ज्यादा हो सकती है।
प्रत्याहार – इसका सरल अर्थ है त्याग या छोड़ देना। मैं इसका पूरा अर्थ बाद में अलग तरीके से अलग ब्लॉग पोस्ट में समझाऊँगा। लेकिन किसे छोड़ना? प्राथमिक रूप से, इसमें दस इंद्रियों में से पांच ज्ञान इंद्रियों के विशेष अनुभूति को छोड़ना है। ओह! यह सुनने में कठिन लगता है, है न? नहीं, मैं सरल कर देता हूँ। पांच ज्ञान इन्द्रियां हैं - चक्षु - आंख, कर्ण - कान, नासिका - नाक, जिह्वा - जीभ, त्वचा - चमड़ी। इनके विशेष अनुभूति या महसूस का अर्थ है हर एक का अच्छा और बुरा – अच्छा देखना -बुरा देखना, अच्छा सुनना -बुरा सुनना, खुशबू -बदबू , अच्छा स्वाद- बुरा स्वाद, सुखद स्पर्श-दुःखद स्पर्श। इन मह्सूसों को समान रूप से देखना होगा या पूरी तरह छोड़ देना होगा। चलो, मैं इसे सिर्फ दो उदाहरणों के साथ समझाता हूँ जो आप सभी रोज़ाना करते हो। खुशबू और बदबू को लेकर आप सभी बहुत उत्तेजित दिखते हो। सड़क पर चलते समय, आप अचानक बोल पड़ते हो, “ओह!, कितनी बदबू है यहाँ!” आप दिखाना चाहते हो कि आप इस बदबू से नफरत करते हो। लेकिन उन लोगों के बारे में क्या जो इस बदबू के बीच में रहते हैं? इसे बंद करना होगा। आपकी सहनशीलता ऐसी होनी चाहिए कि इससे आपको कोई फर्क ही न पड़े। उसी तरह, बहुत से लोग रेस्टोरेंट में परेशानी पैदा करते हैं - ‘यह क्यों ऐसा है? मसाला कम, नमक कम, कोई स्वाद नहीं, आदि।’ वे घर पर भी यही नाटक करते हैं। वे जीभ का स्वाद लेने के लिए घर में झगड़ा या बहस करते हैं। वे खाने की थाली को हटा भी देते हैं। यह सब कुछ बंद करना होगा। ये महसूस ही इंद्रियों का भोजन हैं। इसे त्याग देना होगा। बाकी जो बचे हैं उन को मैं बाद में और ज्यादा खुल कर समझाऊँगा।
धारणा – यह बहुत ही सरल है। आपको अपने पुरे मन को किसी एक विषय पर स्थिर करना होगा। केवल एक विषय। लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है। मैं बहुत से लोगों को देखता हूँ कि वे तरह तरह के पूजा-पाठ, तरह तरह के मंत्र, तरह तरह के प्रार्थना और अन्य विधिओं का अभ्यास करते हैं! आपको इसे बंद करके केवल एक विषय पर मन लगाना होगा।
ध्यान – यह तो कहने की जरूरत भी नहीं है। सभी को पता है – यह मेडिटेशन है। लेकिन फिर भी अब ज़रा यह समझो कि पिछले छः पहलुओं को पूरी तरह से अभ्यास करने के बाद ही आप मेडिटेशन करने के योग्य बनोगे, सही की ना? इसलिए मैंने पिछले ब्लॉग पोस्ट में कहा था कि अगर आपने तैरना नहीं सीखा है, और आप किसी नदी के बीच में फेंके गए हो, तो क्या आप अपनी बांहों और पैरों को हिलाकर किनारे तक पहुंच सकोगे? तो, अब आप समझ सकते हो कि ज्यादा तौर पर लोग मेडिटेशन के बारे में जो भी बात समाज में फैला रहे हैं वह सब पूरी तरह से सही नहीं है। पहले अपने आप को तैयार करो। आज से ही शुरू कर दो। बहुत ज्यादा समय नहीं लगेगा।
समाधि – आप इसे 'मोक्ष' कह सकते हो। हालांकि, मैं एक और शब्द कहूँगा। यह कुछ अलग है। और वह है 'प्राप्ति' । मेडिटेशन करते हुए इस स्तर पर पहुंच कर अगर आप 'मोक्ष' चाहते हो, तो आपको 'मोक्ष मिलेगा। अगर आप कुछ और चाहते हो, तो वह भी मिलेगा। लेकिन योग का मुख्य और अंतिम उद्देश्य वास्तव में मोक्ष ही है। तो मैंने दूसरा शब्द क्यों कहा? क्योंकि आप सभी जानते हो कि इस दुनिया में सैकड़ो करोड़ की आबादी में से 'मोक्ष' चाहने वाले लोग लगभग 'न' के बराबर है । इसलिए मैंने कहा कि जब आप इस स्तर पर पहुंचोगे, तो आपको वह सब कुछ मिलेगा जो भी आप चाहोगे। शायद थोड़ी ज्यादा देर लग सकती है। लेकिन उस समय, शायद आपकी इच्छा ही बदल जाए। अब, शुरू करने से पहले जो चीज़ आपको बहुत अभिलाषित लग रही है, हो सकता है कि बाद में वह बेहद अर्थहीन लगे।
आज के लिए बस इतना ही। सब कुछ सही ढंग से अभ्यास करते रहो।
अगले ब्लॉग पोस्ट में, आप अपने रोज की जिंदगी में ‘अष्टांग योग’ कैसे करोगे वह मैं सरल तरीके से बताऊंगा। आप का पेशा कुछ भी हो और आप कितने ही व्यस्त क्यों न रहो, 'अष्टांग योग' का अभ्यास मगर सचमुच बहुत सरल होगा।
अब, एक खास बात बताऊँ आपको। कई लोगों ने व्यक्तिगत रूप से मुझ से सीख कर खुद को बदल डाला है। गुस्सा, स्ट्रेस सब कुछ चला गया है, और उनकी काम काज की हालत भी सुधर गई है। वे कहते हैं कि वे अब शांत हैं, अपने मन पर काबू पाया है, और उनकी शारीरिक और मानसिक शक्ति बढ़ गयी है। कई लोगों के परिवारिक विवाद हल हो गए हैं, मेरा मतलब है, उन्होंने अपने परिवारों में खुद ही विवाद मिटा लिए हैं।
अगर आप में से किसी को व्यक्तिगत रूप से सीखना है, तो आप मुझसे WhatsApp मैसेज के जरिये संपर्क कर सकते हो। सभी की गोपनीयता की रक्षा करना मेरा पहला कर्तव्य है।
शांत रहो। आपके मन की एकाग्रता बढ़े। चारों ओर शांति हो।

क्या बात है सर। बहुत ही Useful & meaningful व्लॉग है ये। 👌😊
Thank you so much.
नमस्कार🙏
मैंने आज प्रातः ५ बजे पढ़ना शुरू किया और ५:५९ पर समाप्त हुआ, मतलब मुझे इसका अध्ययन करने में ५९ मिनिट लगा । इस एकाग्र पल का मैं बहुत समय से सोच रहा था, जो मुझे आज मिला । इसे पढ़ते समय बहुत सी बाते, जो की व्यक्तिगत मिलने के दौरान हमारी होती है, वह इसमें पाया। इसमें मुख्य बिंदु के अलावा कुछ और भी बिंदु से जुड़ी बातों का ज्ञान हुआ । *जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के लिए आपका ब्लॉग एक अच्छा व सरल माध्यम है* ।
आपको बधाई इस सुन्दर लेखनी के लिए!
Thank you so much.
आप का ब्लॉग पढ़ते हुए एक नई ऊर्जा एक नए किरण का आभास हुआ,बहुत सारे लोग यह नहीं समझ पाते की योग के कितने चरम है ,और इस आयाम को किस प्रकार से प्रारंभ करना चाहिए ,इस विद्या को आप जिस तरह से आप ने समझाया है मुझे आज तक ऐसा कही भी किसी योग गुरु से नहीं मिला!! आप एक कुशल योग गुरु है आप के सानिध्य में आने से मानव जीवन के कल्याण के साथ एक नई दिशा और एक नई ऊर्जा मिलेगी !!
Thank you so much.